शिष्य के जीवन में एक गुरु की भूमिका क्या होती है

नमन!
शिष्य के जीवन में एक गुरु की भूमिका क्या होती है, यदि साधक से पूछें तो शायद वो बता न पाए, नहीं कि वो बता नहीं सकता पर जैसे ही बताने के लिए पहला शब्द उच्चारित करेगा वो स्वत:असत्य में प्रवेश करने लगेगा।
सदगुरुदेव एक बहाव हैं,जीवन के। शिष्य गुरु में ही जन्मता है,पलता है और विदा होता है। वो बहाव हैं, एक सतत धारा हैं; श्रद्धा के ठोस व प्रामाणिक रूप हैं जिसके बिना साधक को न प्रेम न शांति और न ही प्रसन्नता स्पर्श कर सकती है। यह भी साधक मात्र की बनावट पर निर्भर करता है कि वो गुरुदेव से कौन सा रस व स्वाद ग्रहण करता है,वहां तो जो कुछ है सो अनंत है न।
श्रद्धा में जो जी सकता है वो अनिवार्यत:सम्पूर्ण जगत से अपनी अखंडता को कम ही सही,बौद्धिक ही सही अवश्य जानता है। वो देख पाता है सम्पूर्ण जगत अपरिहार्य रूप से श्रद्धावान है, श्रद्धा इस दृश्यमान संसार का स्वभाव है। कहे अनकहे ढंग से ये मनुष्य का भी स्वभाव है पर चूंकि मनुष्य अपने समयाधीन होने में इतना डूबा है कि समयातीत स्वभाव, श्रद्धा को जान ही नहीं पाता। प्रेम और श्रद्धा सहोदर हैं, और कोई भी एक मिल जाए तो संसार व साधक के मध्य भ्रमवश उत्पन्न द्वैत को खत्म कर सकती है।
मेरी दृष्टि में क्राइस्ट का वो वचन की ऐ मेरे प्रेमियों मुझे खाओ पीओ और मुझे अपनी मांस मेद मज़्जा बन जाने दो संभवतः इसी बात की ओर इशारा है कि मेरी परमपिता के प्रति श्रद्धा को देखो और श्रद्धा को अपने भीतर से मुक्त हो जाने दो।
निरीहिता में सबका जन्म होता है और भय में मृत्यु, यदि निरीहिता श्रद्धा को न जन्मा सके, यह न बता सके कि निरीह का बल तो स्वयं परमात्मा हैं तो यह अहंकार को जन्मा देती है और कालांतर में इस झूठे अहंकार की निष्पति भय,अवसाद व विक्षिप्तता बन जाती है। एक नवजात बाघ का शावक, एक अभी खिला पुष्प, वृक्ष पर चटकी नई कोपल,घास पर टिकी ओस की बूंद ये सब इसी निरीह होने की गवाही देती हैं। जीवंतता, शिशुवत कोमलता और श्रद्धा समानुपाती होते हैं और अपने में संपूर्ण आकाश को समेटे हुए होते हैं।
सदगुरु को भी निकट से देखें तो वो भी सौ प्रतिशत निरीह हैं, शावक,पुष्प,ओस और कोपल की भांति, पूरे परमात्मा को तीन हाथ के शरीर में संभाले। परमात्मा कोई सत्ता नहीं गुणवत्ता है और यह गुणवत्ता चौबीस कैरेट शुद्ध रूप में गुरुदेव में परिलक्षित होती है। स्वीकार भाव इतना कि कल्पना से परे, एक साधारण सी लगने वाली खांसी भी खासी परेशान कर दे सकती है, जीवाणुओं का भी तो निषेध नहीं है न वहां, nobody is invited but everybody is welcome, इसलिए उनका भी स्वागत है और यह एक उक्ति ही नहीं बल्कि जीवनचर्या है और शायद यही है भक्ति का चरम—श्रद्धा।
परम सहजता ही परम भगवत्ता है।

अनंत श्री व बोधि माँ चरण कमलों में समर्पित।

abhishek…

Leave a Reply