कहते हैं—
यहाँ कुछ भी टूटा हुआ नहीं है,
कुछ भी अलग-थलग नहीं।
हर श्वास
दूसरी श्वास को
थामे हुए है।
सब कुछ—
सब कुछ को
संभाल रहा है।
जब यह समझ
भीतर उतरती है,
तो एक अद्भुत भरोसा
जन्म लेता है—
कि यह संसार
किसी पराए घर की तरह नहीं,
बल्कि
अपने ही आँगन की तरह है।
❤️❤️
अब लगने लगा है—
कि अस्तित्व हमारा नहीं,
हम ही
अस्तित्व के हो गए हैं।
❤️❤️
kusum…
