
अनंत काल के लम्बे अंतराल में जब चराचर में बोध और प्रेम की तीव्र उत्कंठा उठती है तब इस सूखी धरा को तृप्त करने परमात्मा अपने तीन आयामी रूप को धारण करता है। असंख्य अवतार इसी रूप के द्योतक हैं। अचरज है कि वो साधारण से भी साधारण दिखते हैं पर विस्मय भी होता है कि होते वो असाधारण हैं। जब हमारे बीच होते हैं तो पहचान कठिन होती है, जब चले जाते हैं तब सदियों बाद उन पर शोध होता है और मंदिर बनते हैं।
भगवान बुद्ध और अनंत श्री दो ऐसे सदगुरु हैं जो आमजन के लिए उपलब्धता में शायद सबसे अव्वल हैं। अनंत श्री के सानिध्य में कोई साधना नहीं हो सकती, बस पहचान हो सकती है। पर वो इतना सघन प्रकाश हैं कि आँखें चुंधिया जाती हैं और अंधेरा छा जाता है। जैसे प्रकाश की लालसा में स्रोत के बहुत निकट चले जाएं तो प्रकाश लुप्त हो जाता है और अंधेरा हो जाता है। संभवतः सारी साधना इसी प्रकाशित अंधकार के साथ समरूप हो जाने की है।
जेतवन में अनंत श्री के साथ बिताया पल मानसिक समय का हिस्सा नहीं है, शाश्वत वर्तमान है, जिसे लौट आने के बाद अभी भी और कभी भी जिया जा सकता है। पुरातत्व विभाग को बुद्ध से कोई लेना देना नहीं है यह संस्था मात्र खंडहरों को संरक्षित रखने के लिए उत्तरदाई है, यदि हमें वहां बुद्ध का संस्पर्श हुआ, उनकी देशनाओं, उनकी उपस्थिति का एहसास हुआ तो उसके पीछे का कारण हमारे बीच “वर्तमान—तथागत” का होना है। वो ईसा पूर्व वाले तथागत अब कहीं नहीं हैं, उनका होना समय व स्थान के पार हो चुका है और हम उन्हें जेतवन जो कि एक स्थान है और इक्कीस मार्च जो कि समय है में अगर महसूस कर पा रहे हैं, किसी अकथनीय दिव्यता के साक्षी हो पा रहे हैं, एक मस्ती को आँखों पर चढ़ा जान पा रहे हैं और चमत्कार देख पा रहे हैं तो उसका सीधे सीधे वर्तमान—तथागत से संबंध है और किसी से भी नहीं। इतने समय साथ रहते हुए मैं या कोई मित्र यह कह सके कि अनंत श्री के एक अंश को भी जान गए तो यह मेरी नीरी मूर्खता होगी।
जेतवन में सबके साथ टहलते समय मुझे भी लग रहा था सब भिक्षुओं के साथ पूर्ववर्ती तथागत टहल रहे हैं। मन का एक हिस्सा Deja vu अनुभव कर रहा था और दूसरा जैसे कह रहा था कि गौतम बुद्ध व अनंत श्री आपस में पूरक हैं। बोधि वृक्ष से कुछ मित्रों द्वारा याद के लिए नई कोंपल तोड़ने के प्रयास को जब अनंत श्री ने मना किया तो उनके शब्दों में उस जर्जर व वृद्ध वृक्ष के प्रति करुणा और मैत्री देख मैं स्तब्ध रह गया। फिर भी जाने कहां से दो पत्तियों की कोंपल जो कि भूमि पर गिरी थीं पर मेरी दृष्टि गई जिसे मैने अनंत श्री को समर्पित कर दिया, उन पत्तियों को हथेली पर रख जैसे अनंत श्री ने क्षण भर को कोई मौन संवाद किया जिसे मैं समझ नहीं सकता। मेरी दृष्टि में गौतम बुद्ध श्री राम की भांति हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम और दूसरी तरफ कमलनयन अनंत श्री लीला पुरुषोत्तम। कितना विस्मय है कि अभी कुछ महीनों पहले गीता प्रवचनों के समय अनंत श्री सौ प्रतिशत कृष्ण हो चुके थे और बुद्ध अवकाश पर थे। तब हर कोण से हर भाव भंगिमा से आप में श्री कृष्ण की उपस्थिति परिलक्षित हो रही थी। स्पष्टता शायद कृष्ण से भी कहीं अधिक। उसके पहले ताओ, जब आप लाओत्से हो जाते हैं और समझ में लाओत्से से भी कहीं अधिक प्रौढ़ व वरिष्ठ, फिर आप वशिष्ठ बन जाते हैं जिनके चरणों में बैठ श्री राम आत्मज्ञान पाते हैं। वो श्री राम जिन पर कालांतर में विश्व भर में दर्जनों रामायण लिखीं गईं। फिर आप अष्टावक्र बन जाते हैं और राजा जनक को क्षण भर में विदेह कर देते हैं। कभी मन हुआ और महर्षि व्यास बन गुरु—गीता का ज्ञान दिया और फिर शिव बन… फिर…..फिर…..अनंत है लीला। पर आप हैं कौन यह किसी को नहीं पता जो इतने इतने रूपों में इतनी सहजता से ढल जाते हैं। कभी अनंत की बैठक में हंसी ठिठोली करते समय लगता ही नहीं कि ये वही हैं जो सत्संग में ज्ञान, भक्ति, समर्पण, समय, जन्म मृत्यु, अहंकार, अद्वैत आदि जैसे जटिल विषयों पर घंटों उपदेश करते हैं।
इतनी तरलता व सरलता एक सदगुरु के लिए संभव नहीं हो सकती क्योंकि अंततः वह भी तो एक मनुष्य ही है। कुछ सीमाएं कुछ नियम उन्हें भी बांधती ही हैं।
तो कौन है जो इतनी तरलता धारण कर सकता है?
कौन है जिसके होने से मेरा होना सिद्ध होता है?
कौन है जिसके प्रकाश से सभी अतीत के सदगुरु जीवंत हो उठते हैं?
कौन है जिसके पोषण से मन गति पाता है?
कौन है जो मन के हर विचलन में याद आता है?
कौन है जो स्वार्थ और परमार्थ के सटीक मध्य खड़ा है? कौन है जिसके गिर्द असंख्य चित्त अपने परिपथ में स्थिर गति करते हैं? उत्तर मिलना आवश्यक नहीं है, प्रश्न ही पर्याप्त है। सुन्दर बोधि माँ व प्रभु के पावन चरण कमलों में समर्पित।
Anant Sangha…
