*गुरु जी* कहते हैं, “जब दो लोग मिलते हैं, तो असल में दो लोग नहीं मिलते। दो उपस्थितियों के बीच एक संवाद घटता है।” वो अस्तित्व में collective का हिस्सा है।
हम इस संवाद को सामान्यतः समझ नहीं पाते, क्योंकि हम उसे पहचान के तल पर देखते हैं। हम कहते हैं, हम मिले, साथ खाना खाया, बातें हुईं, प्रेम हुआ, निकटता बढ़ी, फिर दूरी बन गई, फिर संबंध बदल गया, फिर शायद रास्ते अलग हो गए।
हमारे पास इस पूरी घटना की एक व्यक्तिगत कहानी होती है। लेकिन क्या यह पूरी कहानी है? शायद नहीं।
क्योंकि व्यक्ति की पहचान के पीछे एक उपस्थिति है, और जब दो उपस्थितियाँ एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं, तो उनके बीच ऐसा कुछ घट सकता है जिसे हमारी भाषा, हमारी स्मृति और हमारी पहचान पूरी तरह समझ ही नहीं सकती। यहीं पर गुरु जी कहते हैं की दो लोगों का मिलन भी trillions कारणों से होता है इसीलिए उसको अकारण कह दिया जाता है।
कभी संवाद शब्दों से होता है, कभी मौन से, कभी साथ रहने से, कभी दूरी से, और कभी किसी के चले जाने के बाद भी वह संवाद समाप्त नहीं होता।
वह हमारे भीतर और उस उपस्थिति के सुगंध से किसी दूसरी भाषा में चलता रहता है। प्रेम की सूक्ष्म ध्वनि में।
हर मिलन में प्रेम के फूल को देखना-
यदि हम अपने जीवन में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को प्रेम के एक फूल की तरह देख सकें, तो शायद संबंधों से पैदा होने वाली बहुत-सी मानसिक अशांति समाप्त हो जाए। क्योंकि तब हम हर मिलन को अपने पक्ष में या अपने विरुद्ध हुई कोई घटना नहीं मानेंगे।
हम यह पूछना थोड़ा कम कर देंगे— “वह मेरे जीवन में क्यों आया?” “वह चला क्यों गया?” “उसने मुझे ऐसा क्यों किया?” “मैंने इतना प्रेम किया, फिर उसने मुझे क्यों नहीं समझा?”
इन प्रश्नों में हमारा मन मिलने की घटना को personal बना देता है। लेकिन फूल की दृष्टि कुछ और है, फूल खिलता है, कुछ फूल बहुत जल्दी मुरझा जाते हैं, कुछ देर तक खिले रहते हैं। कुछ फूलों की सुगंध लंबे समय तक रहती है। और कुछ फूलों की सुगंध उनके मुरझा जाने के बाद भी बहुत देर तक वातावरण में रहती है।
तो क्या जल्दी मुरझा जाने वाला फूल कम महत्वपूर्ण था? नहीं।
फूल की पूर्णता उसकी अवधि में नहीं, उसके खिलने में है। ठीक वैसे ही कोई व्यक्ति हमारे जीवन में कुछ दिनों के लिए आए या वर्षों के लिए—उस मिलन की अस्तित्वगत रूप केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह कितने समय तक हमारे साथ रहा। समय संबंध की अवधि बता सकता है, लेकिन उसकी सुगंध की गहराई नहीं।
Personal और Impersonal का रहस्य-
हमारे जीवन का functional संसार personal के बिना चल ही नहीं सकता।
हमें कहना पड़ता है—यह मेरा मित्र है, यह मेरा प्रेम है, यह मेरा परिवार है, यह मेरा संबंध है। यह personal dimension आवश्यक है।
लेकिन अस्तित्व के तल पर शायद वही घटना impersonal होती है।
यहीं एक बड़ा अंतर है,हम personal बनाते हैं; अस्तित्व उसे impersonal रूप में घटाता है।
व्यक्ति कहता है— “यह मेरे साथ हुआ।”
अस्तित्व कहता है-“यह घटा।”
व्यक्ति कहता है—“उसने मुझे प्रेम दिया।”
अस्तित्व कहता है—“प्रेम की एक धारा इन दो उपस्थितियों के बीच से होकर गुजरी।”
व्यक्ति कहता है—“वह मुझे छोड़कर चला गया।”
अस्तित्व शायद कहता है—**“फूल जितनी देर खिलना था, खिल चुका।”**
इस दृष्टि से मिलन को देखने पर हम दोषारोपण नहीं कर सकते।
इसका अर्थ यह नहीं कि व्यवहार में विवेक समाप्त हो जाए या किसी गलत व्यवहार को उचित मान लिया जाए। व्यक्तिगत जीवन में सीमाएँ और निर्णय आवश्यक हैं। निर्णय को ले कर गुरु जी फोर पॉजिबिलिटीज की बात कहते हैं पशु, मनुष्य, देवता, बुद्ध।
लेकिन भीतर यह समझ बनी रह सकती है कि ** घटना केवल “मेरे साथ” नहीं घट रही।**उसका एक अस्तित्वगत आयाम भी है।
जब दो उपस्थितियाँ मिलती हैं, एक फूल खिलता है, दो लोगों का मिलना केवल एक घटना नहीं है। वह एक **संभावना** है। उनकी उपस्थितियाँ एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं और उनके बीच कुछ नया जन्म ले सकता है। प्रेम,करुणा,आनंद, पीड़ा।सीख, जागरण, परिवर्तन, या कोई ऐसा अनुभव जिसका नाम भी हमारे पास नहीं है।
इसे ही हम **प्रेम का फूल** कह सकते हैं। और फूल का रहस्य यह है कि फूल केवल अपने लिए नहीं खिलता। वह वातावरण को भी बदलता है। उसकी सुगंध हवा में जाती है। यही किसी संबंध के साथ भी होता है।
सुगंध कभी केवल दो लोगों की नहीं रहती— मान लीजिए दो लोग मिले।
उनके बीच प्रेम का कोई अनुभव घटा। उस अनुभव ने दोनों को थोड़ा बदला। अब वे दोनों जब दुनिया में आगे बढ़ेंगे, तो वे पहले जैसे नहीं होंगे। उनके भीतर जो बदला है, वह उनके अगले संबंधों में जाएगा।
उनके मित्रों तक जाएगा। उनके परिवारों तक जाएगा। उनसे मिलने वाले दूसरे लोगों तक जाएगा। और इस तरह दो उपस्थितियों के बीच उठा हुआ अनुभव धीरे-धीरे **collective existence** का हिस्सा बन सकता है।
इसलिए प्रेम की सुगंध का कोई मालिक नहीं होता।
वह हवा की तरह फैलती है।
और हवा यह तय नहीं करती कि किसे छूना है।
जिसके अस्तित्वगत क्षेत्र में वह आती है, उसे छू लेती है।
इसलिए दो लोगों के बीच पैदा हुई सुगंध केवल उन दो लोगों की संपत्ति नहीं रह सकती।
**वह उन सभी को छू सकती है जिनसे उनके जीवन का कोई अस्तित्वगत संबंध जुड़ता है।** लेकिन वो हम नहीं समझ सकते न जान सकते हैं।
अब कुछ फूल जल्दी मुरझाते हैं, कभी कोई व्यक्ति हमारे जीवन में आता है और बहुत जल्दी चला जाता है। हम तुरंत इसे अधूरा कह देते हैं। लेकिन शायद अस्तित्व की भाषा में वह अधूरा नहीं था। शायद उसका फूल उतनी ही देर के लिए था। वह कुछ समय के लिए खिला।
उसने कुछ सुगंध दी। और फिर उसकी पंखुड़ियाँ गिर गईं। हम फूल को देखते हैं, इसलिए मुरझाने को अंत समझ लेते हैं। अस्तित्व शायद सुगंध को देखता है। हो सकता है वह व्यक्ति हमारे जीवन में बहुत कम समय रहा हो, लेकिन उसके आने से हम बदल गए हों। हम थोड़ा अधिक प्रेम करना सीख गए हों। थोड़ा अधिक संवेदनशील हो गए हों। थोड़ा अधिक शांत। थोड़ा अधिक जागरूक।
तो वह मिलन समाप्त कहाँ हुआ? **व्यक्ति चला गया; सुगंध नहीं।**
कुछ फूल देर तक खिलते हैं और कुछ लोग हमारे जीवन में लंबे समय तक रहते हैं। उनके साथ हमारा संबंध वर्षों तक चलता है। हम एक-दूसरे के साथ रहते हैं, बदलते हैं, टूटते हैं, फिर जुड़ते हैं। कभी स्वर मिलता है।
कभी बिगड़ता है। कभी फिर से मिल जाता है। यह भी अस्तित्व में खिला एक लंबी अवधि का फूल है। उसकी सुगंध अधिक समय तक हवा में रह सकती है। लेकिन यहाँ भी बात केवल उन दो लोगों की नहीं है। उनका संबंध जितना गहरा होगा, उसके प्रभाव की तरंगें उतनी ही दूर जा सकती हैं।
क्योंकि **कोई भी गहरा मिलन isolated नहीं होता।** अस्तित्व में कोई चीज अकेली नहीं घटती। मिलना एक Existential Tuning है
दो उपस्थितियों के मिलने का एक और रहस्य है—**tuning**।
जैसे दो वाद्ययंत्र। दोनों के अपने स्वर हैं। लेकिन जब वे पास आते हैं, तो एक संभावना पैदा होती है—
क्या दोनों एक-दूसरे के स्वर को सुन पाएँगे?
क्या उनमें सामंजस्य पैदा होगा?
क्या वे एक साथ कोई नया संगीत रच पाएँगे?
इसी तरह दो लोग जब मिलते हैं तो उनके बीच एक **existential tuning** शुरू होती है।
कभी tuning तुरंत हो जाती है। किसी व्यक्ति से मिलते ही भीतर से लगता है— **“यह अपना-सा है।”** कभी tuning बनने में वर्षों लगते हैं। और कभी बहुत निकट रहने के बाद भी दोनों की उपस्थिति एक ही स्वर में नहीं आ पाती।
लेकिन यहाँ एक और गहरा रहस्य है।
**ट्यूनिंग न बनना भी कभी-कभी ट्यूनिंग की प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।**
कभी कोई व्यक्ति हमारे जीवन में बना रहता है, लेकिन उसके साथ हमारी tuning नहीं बनती।
हम परेशान होते हैं।
हम सोचते हैं—
“यह मेरे जीवन में क्यों है?”
लेकिन हो सकता है उसका होना ही हमें हमारे भीतर के किसी असंतुलित स्वर से परिचित कराने के लिए हो। जैसे गिटार में हम ट्यूनिंग के लिए यंत्र लगाते हैं वैसे ही।
कोई व्यक्ति हमें धैर्य सिखाता है। कोई हमारी अपेक्षाएँ दिखाता है। कोई हमारे अहंकार को सामने लाता है।कोई हमारी करुणा को जगाता है। कोई हमारी सीमाएँ दिखाता है।
कोई हमें यह सिखाता है कि प्रेम का अर्थ किसी दूसरे को अपने अनुसार बदल देना नहीं है।
इसलिए हर संबंध का उद्देश्य हमें सुख देना नहीं होता।
कुछ संबंध हमें **अधिक tuned** करने आते हैं।
जैसे किसी वाद्य को सही स्वर में लाने के लिए कभी तार को ढीला करना पड़ता है और कभी कसना। — और कभी tuning शाश्वत हो जाती है।
कभी दो उपस्थितियों के बीच ऐसी tuning बनती है जो समय और दूरी से भी समाप्त नहीं होती। वहाँ संबंध केवल साथ रहने का नाम नहीं रह जाता। दोनों के बीच कोई ऐसा स्वर मिल जाता है जो भीतर बहुत गहरा उतर चुका है। फिर दूरी भी उस स्वर को पूरी तरह मिटा नहीं पाती।
क्योंकि tuning केवल शरीरों की निकटता नहीं है। **वह उपस्थितियों का सामंजस्य है।** जब दो बुद्ध मिलते हैं। और यहीं से मिलन का रहस्य अपने सबसे गहरे आयाम में प्रवेश करता है।
यदि सामान्य दो उपस्थितियों का मिलन एक फूल है, तो दो बुद्धों का मिलन क्या होगा? उसे हम **relic flower** की तरह समझ सकते हैं।
सामान्य फूल खिलता है।
सुगंध देता है।
और फिर मुरझा जाता है।
लेकिन बुद्ध की उपस्थिति से उठी सुगंध को केवल उनके व्यक्तिगत जीवनकाल तक सीमित नहीं किया जा सकता।
वह देशना बन सकती है। वह परंपरा बन सकती है। वह साधना बन सकती है। वह किसी दूसरे की चेतना में जागरण का कारण बन सकती है। **Relic उस उपस्थिति का संकेत है जिसकी सुगंध समय के बाद भी कार्य करती रहती है।**
दो बुद्धों का मिलन तब केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं रह जाता।
वह एक ऐसा फूल बन सकता है जिसकी सुगंध आने वाली चेतनाओं तक पहुँचे।
कोई व्यक्ति बहुत बाद में उस सुगंध के क्षेत्र में प्रवेश करे और उसके भीतर कुछ बदलने लगे। उसे शायद पता भी न हो कि वह किस फूल की सुगंध से गुजर रहा है। लेकिन फूल अब भी अपना काम कर रहा है।
**फूल दिखाई नहीं देता—सुगंध काम करती रहती है।**
यहीं पर गुरु जी कहते हैं time collapse की घटना भी घट सकती है मतलब जब कोई अचानक उस tuning में आ जाए और ऐसे देखें की एक चादर है और अचानक चादर को बीच में से खींच दिया जाए तो हर कोना आपस में मिल जाता है अतीत भविष्य सब एक ही घटना में समा जाते हैं और उस उपस्थिति से direct मिलना घट सकता है।
— तब किसी के जाने को कैसे देखें?
शायद तब किसी के जाने का अर्थ भी बदल जाता है।
कोई चला गया।
हम कहते हैं—
“सब समाप्त हो गया।”
लेकिन शायद सब समाप्त नहीं हुआ।
हो सकता है फूल की पंखुड़ियाँ गिर गई हों।
लेकिन उसकी सुगंध अभी भी हवा में हो।
और कभी-कभी किसी फूल की सुगंध इतनी गहरी होती है कि फूल दिखाई नहीं देता, फिर भी वातावरण बता देता है— कुछ लोग हमारे जीवन से चले जाते हैं, लेकिन उनके कारण हम जो बन गए, वह हमारे भीतर रह जाता है।
हमारी दृष्टि बदल जाती है, हमारा प्रेम बदल जाता है, हमारी संवेदनशीलता बदल जाती है, और फिर हम जिन लोगों से मिलते हैं, उनके जीवन में भी उस पुराने मिलन की कोई न कोई सुगंध पहुँचती रहती है। यही collectivity का रहस्य है।
अंततः मिलन हमारा नहीं होता शायद इस पूरे रहस्य को एक वाक्य में समझना हो तो वह यह होगा—
**मिलन हमारा personal अनुभव हो सकता है, लेकिन उसका अस्तित्वगत प्रभाव impersonal होता है।**
हम उसे अपना कहते हैं क्योंकि पहचान को ऐसा करना पड़ता है।
लेकिन अस्तित्व उसे अपने भीतर ले लेता है।
एक फूल खिलता है। कुछ समय रहता है।
फिर मुरझाता है।
लेकिन उसकी सुगंध आगे बढ़ती रहती है।
और शायद प्रेम का सबसे सुंदर रूप यही है—
**फूल को पकड़ना नहीं, उसकी सुगंध को पहचानना।**
तब हम किसी व्यक्ति को अपने जीवन की संपत्ति की तरह नहीं देखते।
हम उसे एक उपस्थिति की तरह देखते हैं।
एक फूल की तरह।
एक संवाद की तरह।
एक tuning की तरह।
और तब उसके आने पर कृतज्ञता हो सकती है।
उसके रहने पर प्रेम।
उसके बदलने पर समझ।
और उसके जाने पर भी भीतर कोई युद्ध आवश्यक नहीं।
क्योंकि हम जान सकते हैं—
**फूल का मुरझाना उसके खिलने को झुठलाता नहीं।**
*जन्म* — फूल का दिखाई देना, एक अस्तित्वगत संयोग घटना-
यहीं से फूल की उपमा हमें जन्म के रहस्य तक ले जाती है।
फूल कब पैदा होता है? जब वह मिट्टी के भीतर से अचानक एक दिन दिखाई देता है, तब? या जब बीज के भीतर उसकी संभावना छिपी थी, तभी से? हम सामान्यतः जन्म को उस क्षण से जोड़ते हैं जब कोई रूप पहली बार दिखाई देता है।
एक शिशु जन्म लेता है।
एक व्यक्ति हमारे जीवन में आता है।
एक संबंध शुरू होता है।
एक प्रेम पहली बार व्यक्त होता है।
हम कहते हैं—
“यहाँ से सब शुरू हुआ।”
लेकिन अस्तित्व की दृष्टि से संभव है कि वह शुरुआत उतनी सरल न हो। फूल का दिखाई देना उसकी पूरी कहानी नहीं है।
उसके पीछे मिट्टी है। बीज है। ऋतु है। जल है। प्रकाश है।
एक पूरा अदृश्य वातावरण है।
उसी तरह किसी व्यक्ति का हमारे जीवन में आना भी केवल वह क्षण नहीं है जब हम पहली बार उससे मिलते हैं।
उसके पीछे अनगिनत परिस्थितियाँ हैं। अनगिनत संबंध हैं।
अनगिनत घटनाएँ हैं। एक पूरा अस्तित्वगत क्षेत्र है, जिसने उस मिलन की संभावना बनाई। इसलिए जन्म शायद केवल किसी रूप का आरंभ नहीं है।
जन्म वह क्षण है जब कोई अदृश्य संभावना पहली बार दृश्य होकर कहती है—
“अब मैं फूल हूँ।”
और *मृत्यु* ?
फूल की पंखुड़ियाँ गिरती हैं। मतलब अब वो सारे संयोग नहीं मिलते उस फूल को—संयोग हटने लगते हैं पत्तियां गिरने लगती हैं।
हम कहते हैं—
“फूल मर गया।” लेकिन क्या सचमुच फूल समाप्त हो गया?
उसका दृश्य रूप समाप्त हुआ।
पंखुड़ियाँ मिट्टी में लौट गईं।
उसकी सुगंध हवा में जा चुकी है।
उसका पराग किसी और संभावना को जन्म दे चुका है। लेकिन वही फूल नहीं जन्मा है वो धारा ही आगे बढ़ रही है यहीं हम *life force* की घटना को समझ सकते हैं। अस्तित्व हमेशा विकास की ओर विराट की ओर जाता है।
तो मृत्यु को यदि केवल रूप के समाप्त होने के रूप में देखा जाए, तो कहानी बहुत छोटी हो जाती है।
मृत्यु शायद फूल का अंत नहीं, उसके दृश्य रूप का परिवर्तन है।
जन्म में जो दिखाई देता है, मृत्यु में वही दिखाई देना बंद हो जाता है। लेकिन जो दिखाई नहीं देता—उसकी यात्रा कहाँ समाप्त होती है? यही रहस्य है। उपस्थिति की सुगंध है। और यही सुगंध अग्रसर है।
और शायद इसी यात्रा को समझने के लिए *महामृत्युंजय* मंत्र को एक अलग दृष्टि से पढ़ा जा सकता है-
**ॐ त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥**
मंत्र का आरंभ होता है—
**“त्र्यम्बकम्”** से।
शाब्दिक रूप से त्र्यम्बकम् का अर्थ है—तीन नेत्रों वाला।
लेकिन चेतना की भाषा में वह द्वैत के पार देखने वाली दृष्टि का प्रतीक है।
दो आँखें संसार को द्वैत में देखती हैं— मैं और तुम।
अपना और पराया।
सुख और दुख।
तीसरा नेत्र उस दृष्टि का संकेत है जहाँ देखने वाला केवल बाहरी रूप नहीं देखता, बल्कि उसके पीछे छिपी एकता को देखना शुरू करता है।
इसलिए— “ॐ त्र्यम्बकं यजामहे” को चेतना की भाषा में ऐसे समझा जा सकता है—
हम उस त्रिनेत्र चेतना की ओर मुड़ते हैं, जो द्वैत के पार देखती है; जहाँ ‘मैं’ और ‘तुम’ के बीच की दूरी धीरे-धीरे प्रेम में विलीन होने लगती है।
और जैसे ही दृष्टि बदलती है, अगला शब्द आता है—“सुगन्धिम्।”
सुगंध दिखाई नहीं देती, फिर भी उसकी उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता।
एक फूल अपनी सुगंध को किसी पर थोपता नहीं। वह बस खिलता है और उसकी सुगंध अपने आप फैलने लगती है।
ठीक वैसे ही जब चेतना भीतर से प्रेम में खिलती है, तो प्रेम कोई विचार या प्रयास नहीं रह जाता। वह उपस्थिति की सुगंध बन जाता है।
प्रेमी व्यक्ति प्रेम करने की कोशिश नहीं करता—
उसकी उपस्थिति ही प्रेम की तरह अनुभव होने लगती है।
ऐसी चेतना जिसकी उपस्थिति स्वयं एक सुगंध बन जाए।
इसके बाद आता है पुष्टिवर्धनम्
जो भीतर के जीवन को पुष्ट करता है, जो चेतना को पोषण देता है और उसे अधिक पूर्ण, अधिक जीवंत और अधिक विस्तृत बनाता है। प्रेम यही करता है।
वह हमें छोटा नहीं करता। वह हमारे भीतर जीवन की क्षमता को बढ़ाता है। वह हमें दूसरे से बाँधने के बजाय धीरे-धीरे उस सीमा को मिटाता है जहाँ हम दूसरे को ‘दूसरा’ मानते हैं।
फिर मंत्र कहता है—
“उर्वारुकमिव बन्धनान्…”
जैसे पका हुआ फल बेल से सहज रूप से अलग हो जाता है। यहाँ मुक्ति किसी संघर्ष से नहीं आती। कुछ तोड़ना नहीं है, कुछ जीतना नहीं है।
जब चेतना की एक निश्चित यात्रा हो जाती है, तो पुराने बंधन अपने आप गिरने लगते हैं। और शायद प्रेम चेतना को पकाने वाली सबसे सहज शक्ति है।
क्योंकि प्रेम में धीरे-धीरे अहंकार पिघलता है, अलगाव कम होता है और ‘मैं’ की कठोरता नरम पड़ती है।
तब आती है अंतिम पंक्ति—
“मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।”
उन सीमाओं से मुक्त हो जाऊँ जो मुझे जीवन की अमृत चेतना से अलग करती हैं।
तब अमृत कोई मृत्यु के बाद मिलने वाली वस्तु नहीं रह जाता।
अमृत वह चेतना है जिसमें जीवन अपने पूरे विस्तार में अनुभव होने लगता है।
वैसे ही प्रेम की गहरी उपस्थिति अपने दृश्य रूप से आगे भी जीवित रहती है।
आभार 🙏🏻