प्रेम..प्रणाम…🙏🏾
अस्तित्व मेहरबान है..अनंत श्री के माध्यम से जीवन का रहस्य उजागर हो रहा है..आध्यात्मिक जगत में अनंत श्री से पहले इतना प्रीसाइज, इतना प्रैक्टिकल मुझे नहीं लगता पहले कभी कहा गया..इस समय जो कोई भी अनंत श्री के साथ चल रहा है परम सौभाग्यशाली है..आपके सानिध्य में बैठने मात्र से भीतर एक अजीब सी हलचल प्रतीत होती है..पर जीवन में एक रहस्यमई बदलाव की कोई सकारात्मक प्रक्रिया भी प्रारंभ हो जाती है जिसे कहा नहीं जा सकता..पर महसूस किया जाता है.. फिर हमारे भीतर से अनिश्चित सा कुछ बिन कहे कहा जाता है, बिन किये कुछ किया भी जाता..अनंत श्री से जुङा प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर किसी प्रफुल्लता के रूप में जीवन को अलग तरह से आंदोलित होता हुआ देखता है..शायद यही कोई गहरी Inner harmony है जो हमें जीवन से जोङे रखती है अनंत श्री को रूबरू सुन पाओ तो हमें जीवन की स्पष्टता का सहज बोध होने लगता है..आपके सानिध्य में हम बिना किसी शोर के अपने स्वभाव में जीने लगते हैं..ये सच है..एक बुद्ध चेतना के सानिध्य में हम जीवन की स्वतंत्रता को डिटैच होकर जीना सीखते हैं.. वहां हमें किसी का कोई अनुकरण नहीं करना होता, किसी विचार, सिद्धांत आदि के पोषण या अनुसरण में जीने की बाध्यता भी नहीं होती.. अनंत श्री के सानिध्य में हमें सिर्फ चेतना गत मार्गदर्शन उपलब्ध होता है..जो स्वभाव में जीने के लिए अपरिहार्य है.. और पर्याप्त भी..एक बुद्ध स्वाभाविक रूप से सदैव जीवन की समस्वरता में बने रहते हैं.. फिर उनके साथ चलते हुए प्रत्येक व्यक्ति के भीतर स्वाभाविक रूप से जीवन के नैसर्गिक गुण धीरे-धीरे विकसित होने लगते हैं… जीने के लिए.. और स्वयं के भीतर खिलने के लिए भी.. अनंत श्री की प्रेजेंस सभी को समान रूप से उपलब्ध है..निर्भर करता है हम उनके सानिध्य में कितनी शिद्दत से जी पाते हैं…! अक्सर हम स्वयं के स्वभाव के विपरीत.. समाज द्वारा दी गई किसी कंडीशनिंग के अनुसार ही जीते रहते हैं..और इसी कंडीशनिंग को हम अपना होना मान लेते हैं, ये समाज इसी बात को पोषित करता है..फिर हमें ये अहसास भी नहीं होता स्वयं के लिए ये कितना घातक है.. इस कंडीशनिंग में जब जीवन की कोई संवेदना महसूस नहीं होती..तब हम बाहर के भाव या विचारों को स्वयं ओढ़ लेते हैं.. इस तरह हम जीने का कोई प्रायोजित कार्यक्रम बनकर रह जाते हैं..कोई भी कंडीशनिंग हमें मात्र जीने का भुलावा ही देती है..समान कंडीशनिंग के व्यक्ति ही तथाकथित प्रेम का दावा करते हैं.. और कभी भिन्न कंडीशनिंग से निर्मित क्षुद्र अहंकार के कारण हम एक दूसरे के विरोध में दिखाई पड़ते हैं.. जैसे जैसे हम डिटैच होकर जीना सीखते हैं.कोई विचारधारा हमें प्रभावित नहीं करती.. वो मानसिक उधेङबुन भी समाप्त होने लगती है जिसे अनंत श्री विचारणा कहते हैं..जीने में धैर्य जरूरी है..फिर किसी जद्दोजहद से उत्पन्न भीतर का विचलन भी हमें प्रभावित नहीं करता..बाहर का खेल हमें समझ आने लगता है..फिर किसी विरोध या पक्ष में हम न रहकर.जीवन को अपनी सहजता में जीते हैं..हमारा होना जीवन के प्रवाह की तरह होता है..जिसमें हम..प्रेम, शांति, प्रसन्नता और समस्वरता को किसी ठहराव की तरह जी लेते हैं… शायद यही जीवन का विरोधाभास है…!! एक अहोभाव प्रभु.बोधि मां..❤️
Paramveer…
