अनंत संघ

इस कृत्रिम संसार में हम सबने एक ऐसी कल्पना की है— कि कहीं कोई समुदाय, कोई संघ ऐसा हो जो बिल्कुल जंगल की तरह हो।

🍁🍂🌿 अनंत श्री के सान्निध्य में, अनंत संघ के भीतर, वो विशाल वन धीरे-धीरे पनप रहा है। और हम उसी में जीते जा रहे हैं। 🌿🍂🍁

कोई मालिक नहीं,
कोई मलकियत नहीं।
हर दरख़्त अपने साये में मुकम्मल,
हर परिंदा अपनी उड़ान में आज़ाद।

वहाँ सजदा करने को कहा नहीं जाता,क्योंकि
हवा ख़ुद सजदे में झुकी होती है…

अनंत संघ वैसा ही बन रहा है…
जो आया है वो पेड़ बन गया,
जो ठहरा है वो जड़ बन गया,
और जो मिट गया वही नफ़्स बन गया।

अब लगता हैं…

कौन कहे कि तर्त़ीब सिर्फ़ संवरने में है…
प्रेम तो वहाँ भी रक़्स करता है जहाँ सब कुछ बिखरा हुआ हो।

तुम्हारे बाग़ में जहाँ एक पत्ता भी नहीं हिलता…
और जंगली पगडंडियों पर गिरते सूखे पत्तों की सरसराहट।
जब हवाओं से टकराती है,
तो जो साज-ओ-संगीत का समा बंधता है,
तब ज़माने भर की महफ़िलों की रौनक फीकी पड़ जाती है…

🍁🍁हम सब अनंत श्री के सुन्दर सान्निध्य में उस वन की आत्मा बनकर बह रहे है। 🍁🍁

kusum…

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