एक ही प्याले में समंदर उड़ेलने की यह कैसी प्यास है- Anant Sangha…

एक ही प्याले में समंदर उड़ेलने की यह कैसी प्यास है,
हर रंग ओढ़ लूँ, हर राह चल लूँ, मन में यही एक आस है।
वैज्ञानिक का संशय भी बनूँ, फ़क़ीर का ठहराव भी,
रोग की नब्ज़ भी थामूँ, दरवेश का गहरा घाव भी।
जंगल की ख़ामोशी, कभी शहर का शोर होना चाहता हूँ,
जागती आँखों में जलता हुआ कोई भोर होना चाहता हूँ।

मगर एक रूप चुनते ही, सौ रूप पीछे छूट जाते हैं,
एक नदी में उतरने से, कितने किनारे रूठ जाते हैं।
यह जो कसक है अधूरी, यह जो अतृप्ति का भार है,
क्या यह महज़ मेरी सीमा, मेरा ही कोई लाचार है?
कि सब कुछ चखना था मुझे, मगर दिन ढलने लगा,
परिमित देह के संकरे दायरों में, असीम मन जलने लगा।

फिर ठहर कर सोचा, तो भीतर इक पर्दा सरक गया,
यह भूखा मन मेरा नहीं, यह तो किसी और का विस्मय था।
वह जो मूल स्रोत है, जो शून्य से अस्तित्व रचता है,
क्या वही मेरे भीतर बैठ, हर रस को जीना चाहता है?
अगर सिर्फ़ मोक्ष ही मक़सद था, तो खेल कब का ख़त्म होता,
एक बुद्ध के मौन के बाद, यह सारा प्रपंच ही न होता।

नहीं, वह ख़ामोशी में बंधकर रहना नहीं चाहता,
वह केवल एक ही सुर की लय में बहना नहीं चाहता।
वह द्वैत के हर क्रम-संचय को, हर द्वंद्व को पाना चाहता है,
कभी राजा, कभी रंक, कभी वैरागी बनकर आना चाहता है।
वह हर आँख से देखना चाहता है सूरज के उगने का क़हर,
हर सीने से महसूस करना चाहता है इश्क़ और ज़हर।

तो यह मेरी बेचैनी नहीं, यह तो उसी की तृष्णा है,
अनंत आकारों में रूप बदलने की वही एक लीला है।
मैं तो बस इक खिड़की हूँ, जिससे वह संसार को तकता है,
अपने ही रचे हुए रंगों में, वह ख़ुद को बाँट कर चखता है।
अब कोई मलाल नहीं कि कुछ छूट गया, कुछ पा लिया,
जो मैं नहीं जी सका, वह उसने किसी और देह में जी लिया।

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