*राहें जुदा हों, ख़याल जुदा हों, फिर भी दिलों में फ़ासला हो—ज़रूरी तो नहीं।* – अनंत संघ
*राहें जुदा हों, ख़याल जुदा हों, फिर भी दिलों में फ़ासला हो—ज़रूरी तो नहीं।* – अनंत संघ
🪷 *राहें जुदा हों, ख़याल जुदा हों, फिर भी दिलों में फ़ासला हो—ज़रूरी तो नहीं।* 🪷
बहुत पहले मैंने अपने गुरु, हमारे *Modern Buddha* — अनंत श्री से एक सवाल किया था। मेरी बुद्धि बड़ी ज़िद्दी है— बिना तर्क के झुकती नहीं, बिना समझे मानती नहीं।
लेकिन जैसा अनंत श्री अकसर कहते हैं—
🪔 *गुरु भी बड़े गुरु होते हैं।* 🪔
तो सवाल ये था मेरा उनसे विचार अलग हों, भाव अलग हों, रास्ते अलग हों— तब भी प्रेम संभव है। साथ में चलना संभव है, सम्मान संभव है?
पर आज मुझे मेरा उत्तर मिल रहा हैं, बल्कि कभी-कभी गुरु शिष्य संबंध मतभेद के पार ही दिखाई देता है।
*गुरु बुद्धि को हराते नहीं, उसकी हद दिखा देते हैं।*
एक मिसाल जो मुझे बहुत प्रिय हैं, प्रेम और सम्मान की ऐसी भी हो सकती है—
🪷 *जैसे कबीरदास जी और उनके गुरु रामानंद* के बीच — मूर्ति-पूजा को लेकर मत भिन्न थे, मगर मतभेद उनके प्रेम के बीच कभी दीवार नहीं बना। कबीर का हृदय अपने गुरु के लिए फिर भी प्रेम में डूबा रहता था, और गुरु भी अपने शिष्य को उसी अपार प्रेम से देखते थे।
…कहते हैं, गुरु की साधना और आराधना की राह अलग थी, और कबीर की अपनी दृष्टि उनसे मुख़ालिफ़।
कबीर मूर्ति-पूजा पर भी सवाल उठाते थे—और उनके गुरु स्वामी रामानंद सगुण उपासक। स्वामी रामानंद मुख्यतः भगवान राम के उपासक थे। वे वैष्णव भक्ति परंपरा से जुड़े थे।
और वही कबीर कहते –
*पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़*
*ताते ये चक्की भली, पीस खाए संसार*
यदि पत्थर की पूजा करने से भगवान मिल जाते हैं, तो मैं पूरे पहाड़ की पूजा करूँ। उससे तो घर की चक्की अच्छी है, जो अनाज पीसकर पूरे संसार का पेट भरती है।
मगर देखिए इबादत की फ़क़ीरी— मत से मुख़ालिफ़त थी मगर गुरु से नहीं। विचारों में फ़ासला था, मगर दिल में नहीं।
लोग पूछते—
“जब तुम उनकी बात से सहमत नहीं, तो फिर गुरु का इतना सम्मान क्यों?”
और गुरु का ज़िक्र आते ही कबीर जी की आँखे भीग जाती ।कहते सब तर्क एक तरफ़, सारी बहस एक तरफ रख—
🪷 *साहिब की साहिब जाने।* 🪷
मूर्ति-पूजा को लेकर राहें अलग थीं, नज़रिए मुख़्तलिफ़ थे, मगर इश्क़ की राह में ये फ़ासले कहाँ टिकते हैं। शिष्य का मत अपने स्थान पर था, मगर गुरु के लिए हृदय उसी शिद्दत से झुकता था।
और गुरु भी शिष्य के मत को बदलने की ज़िद में नहीं, बल्कि उसे उसकी पूरी हस्ती समेत अपने प्रेम में सँजोए रहे। यही तो रूहानी रिश्ता है—
जहाँ विचार अलग हो सकते हैं, मगर दिलों में मनभेद नहीं होता। जहाँ इश्क़ को अपने जैसा बनाने की ज़रूरत नहीं पड़ती,कितनी अजीब बात है— कभी कभी ज़ुबान गुरु के विचार से असहमत हो सकती है…
मगर दिल गुरु के प्रेम से कैसे असहमत हो? मत अपना रह सकता है, मगर हृदय फिर भी सजदा कर सकता हैं।
🪷 *मतभेद के बीच भी हृदय में कोई मनभेद नहीं।* 🪷
मेरी बुद्धि आज भी सवाल करती है— पर अब हृदय की पतंग की डोर अपने गुरु के हाथ में दे दी हैं, अब पतंग को आसमान का पता नहीं पूछना पड़ता। वह उड़ती है।
ऊपर….और ऊपर… जहाँ तक तर्क की आवाज़ भी पहुँचती हैं, और मेरे हृदय की अनुगूँज भी गूंजती हैं।
🪷ख़यालात जुदा हों तो भी जुदाई नहीं होती,
दिल में अगर इश्क़ हो, तो रुसवाई नहीं होती।
🪷 अपने सवाल रखतीं हूँ मैं,
मैं उनसे बहस करूँ, ये मेरा हक़ भी है,
मगर दिल में उनके वास्ते परछाई नहीं होती।
🪷 मत मेरा अपना हो, ये भी तो फ़क़ीरी है,
इश्क़ में अपनी हस्ती की रिहाई नहीं होती।
🪷ज़ुबाँ कह दे “नहीं”, तो कह लेने दे उसे,
दिल में मगर मुर्शिद से बेवफ़ाई नहीं होती।
🪷मैं डोर अपनी छोड़ चुकी हूँ उनके हाथ में,
अब पतंग को उड़ने में तन्हाई नहीं होती।
🪷पूछे जो कोई—“कैसे है ये रिश्ता?” बस इतना कहूँ—
मतभेद अब भी हो जाते हैं कभी कभार
मगर मनभेद की अब गुंजाइश नहीं होती।