प्रेम ही रहस्यमय जीवन का आधार, विस्तार व सार है और प्रेम ही अंनत अस्तित्व में जीवन की रहस्यमय लीला है,प्रेम ही विराट जीवन के द्वैत में अद्वैत है जिसमें जो भी है अस्तित्व की हां में ही सर्वस्वीकार है।सब तरफ से वो ही रहस्यमय ढंग से खेल खेलता है खिलाड़ी हमें बनाकर। प्रेम के ध्यान व सुमिरन में जीने में आनंद के साथ प्रसन्नता,समस्वरता व शांति है और प्रेम के विस्मरण व भय में जीने में ही टकराव, अशांति, अस्वीकार,बेचैनी व संघर्ष है।
परिस्थितियाँ घटती हैं कर्म घटते हैं परिणाम आते हैं अंतरसंबन्धित अस्तित्व में कोई व्यक्तिगत कर्ता नहीं है,प्रेम में घटती हुई रहस्मय लीला का यही सार है।अनंत श्री के द्वारा समझाए गये इस परम सत्य व तथ्य को कितना भी समझें हम परंतु कर्तापन का शिकार हो ही जाते हैं और विराट अस्तित्व की रहस्यमय व अज्ञेय प्रज्ञा को पूर्णता में देख व बता नही पाते हैं उसे तो बस मौन में महसूस ही कर पाते हैं और श्रृद्धा, सर्वस्वीकार व समर्पण में जी पाते हैं। प्रेम ही जीवन के द्वैत में परम धाम व अनंत लीला में विश्राम है।
दुनिया के किसी भी छोर से लोगों का भारत में आना और भारत से लोगों का दुनियाभर में जाना और तमाम परिवर्तनों का घटना भी विराट व रहस्यमय लीला का ही हिस्सा है और इस लीला के द्वैत में युद्ध व विध्वंस के साथ विज्ञान, सभ्यता व मनुष्य की चेतना का विकास भी सामिल है। ना अंग्रेज अकेले कुछ कर रहे थे, ना मुगल, ना तुर्क, ना अरब ,ना मंगोल और ना ही शक, कुषाण और हूंण आदि सबकुछ परिस्थतियों के अनुसार बस घट रहा था और अभी भी घट ही रहा है।
समय की धारा में ऋषियों, संतो, गुरुओं व बुद्धौं के माध्यम से समय-समय पर जो घटा है वो प्रेम का सार व प्रेम का दान है जिसने रहस्यमय जीवन लीला में प्रेम के अमृत को उजागर करके सनातन जीवन में श्रृद्धा, सर्वस्वीकार, समर्पण व सहजता व सरलता को घटाया है।
अनंत श्री ने अपने चार आर्य सारों के माध्यम से बड़ी सहजता व अनूठेपन में आध्यात्म को रीडिफाइन करके प्रेम व सार को समझाया है और भ्रम को मिटाया है।
अनंत श्री व बोधि माँ की दिव्य उपस्थिति व सानिध्य को बारंबार प्रणाम है !
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