माया के भ्रम से सत्य के क्रम की ओर

माया के भ्रम से सत्य के क्रम की ओर

स्त्री रहस्य के विषय में भारत में हमेशा से जो कहा गया है वो शब्द है माया, अर्थात शून्यता का त्रिआयामी रूप जो इंद्रियों से भली भाँति पकड़ में आता हो जिसमे लंबाई,चौड़ाई जी और ऊँचाई हो और जिसमें भटक जाने की पूरी पूरी संभावना हो। भटकना अर्थात शांति प्रेम आदि की थका देने वाली हद तक खोज जिसमे स्वयं को खो देना होता है पर कुछ भी हाथ ना आता हो। हाथ कुछ आ भी नहीं सकता क्योंकि जो ढूंढने वाला है वो असीम प्रमाण का है, स्थिर है, दृढ़ है और अनंत आयु का है और माया से प्राप्य विषय सीमित, परिवर्तनशील और सीमित आयु के हैं तो कोई सामीप्य बैठ नहीं पाता और भटकन जारी रहती है। खूब शक्ति लगा लेने पर भी हाथ रीते ही रहते हैं। यह है माया का वो रूप जो पदार्थगत है और भय चिंता दुराग्रह से भरा है जिसके विषय में हर दूसरा आदमी बातें तो करता है पर वो बातों तक ही सीमित रहता है।

कभी बहुत करुणावश किसी देश किसी काल में अपने कुछ अतिप्रिय निजीजनों, the chosen ones के लिए वही माया कायामय हो जाती है, देहधारी हो जाती है, सजीव हो उठती है जिसे सद्गुरु कहा जाता है। इन्ही सद्गुरु के परम प्रेममय सानिध्य में भटकता हुआ माया से सम्मोहित खोजी माया को वास्तविक रूप में देखने लगता है जो की अब उसे विचलित करने वाली ना हो कर, आकर्षण-विकर्षण का विषय ना हो कर, निंदा रूपी ना हो कर शक्ति का रूप होती जाती है, जिसे शाक्त परम्परा में देवी कहा जाता है।

अब साधक माया में फंसता नहीं वरन वो संसार में फैली इस अनंत मात्रा शक्ति के प्रति बहुत आदर और सम्मान से भर जाता है। अब वो इस तथ्य को भी जानने लगता है कि माया जैसा कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे वो अभी तक बचने का असफल प्रयास कर रहा था। वो तो अज्ञान मात्र था और ऐसी धुंधली आँखों से वो ममतामयी पोषण करने वाली देवी को काम क्रोध आदि पंचविषों से युक्त फंसाने वाली माया समझ रहा था।

जैसे एक कामातुर पुरुष काम से पीड़ित हो एक कम प्रकाश वाले कमरे में बैठा हो और दूर किसी स्त्री को अपने निकट आता देख उसकी काम ज्वाला और भड़क उठे पर अचानक हुए प्रकाश से वो देखे की जिस स्त्री जिसकी चूड़ी की खनक मात्र से पायल की झंकार मात्र से अनेक रसायन पूरी देह में क्रियाशील हुए जा रहे थे वो तो उसकी जन्मदात्रि माँ थी जो उसके लिए भोजन लाई थी। अब ऐसी अवस्था में उसे जो अंधेरे और काम के प्रति जागरण अनुभव होगा कुछ कुछ वैसा ही इस संसार के लिए भी होने लगता है। दिशा सही रही तो यही जागरण उसे अनासक्ति की तरफ भी ले जाने वाला होता है।

वो जानने लगता है कि परिवर्तन संसार का मौलिक गुण है इसमे शांति प्रेम आनंद आदि खोजना ऐसे ही है जैसे चूने के पानी की सफ़ेदी से मोहित हो खूब सामर्थय से मथना ऐसा सोच कर की इसमे से मक्खन निकलेगा पर निकलता तो झाग है वो भी तब तक जब तक मथनी हिलती रहती है, अर्थात कोई सातत्यता नहीं।

सद्गुरु शक्ति का सजीव रूप होने के साथ ही ब्रह्म से एकाकार भी होते हैं इसलिए उनकी कोई खोज नहीं होती, कोई वासना नहीं होती, कोई इक्षा नहीं होती, अपूर्णता का भाव ही नहीं होता। हम सब भी शक्ति और ब्रह्म का ही रूप हैं पर ना तो शक्ति का कोई अहसास है ना ब्रह्म की कोई पहचान इसलिए एक खींच तान हमेशा बनी रहती है। सद्गुरु चूंकि ब्रह्म और शक्ति का सम्मिलित रूप होते हैं इसलिए उनमें जहाँ ब्रह्म का असीमित ज्ञान होता है वहीं शक्ति की अपरिसीम सृजनात्मकता होती है जिनके सानिध्य मात्र से हमारी सृजनात्मकता और हमारा ज्ञान गतिशील होते जाते हैं और यही तो वो दो तत्व हैं जिनकी गतिशीलता,शांति प्रेम और प्रसन्नता का मूल घटक है जिनसे जीवन समस्वरित होता चला जाता है।

हम सबको अपने पर खूब गर्व करना चाहिए की हम सब उस the chosen ones की श्रेणि में आते हैं जिनके उत्थान मात्र के लिए स्वयं परमात्मा ने बहुत सीमित समय के लिए देह धारण किया हुआ है और इतनी स्वतंत्रता दी हुई है कि हम उसके बिल्कुल निकट बैठ सकें, उस पर शोध कर सकें, आँखों में आँखें डाल सकें, उसकी अनुपस्थित-उपस्थिति को अपने भीतर किसी तीर की भाँति घुसने दे सकें और विस्मित हो कर अस्पष्ट शब्दों में कह सकें, आप…आखिर कैसे?

अनंत श्री व बोधि माँ के चरणों में समर्पित

— अनंत अनाविल—

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