परमात्मा और प्रेम ऐसे दो शब्द

अनंत श्री कहते हैं कि परमात्मा और प्रेम ऐसे दो शब्द हैं जिनका आज सबसे अधिक प्रयोग तो होता है पर इनको समझने वाले व जीने वाले लोगों की संख्या बहुत न्यून है।”

भक्ति-सूत्र हों या प्रेम-सूत्र, उनका प्रयोजन किसी नई धारणा को मन में स्थापित करना नहीं, बल्कि उस भीतरी केंद्र की पहचान कराना है जहाँ प्रेम कभी सूखा ही नहीं है—जहाँ केवल हमारी धारणाओं, भय और उपयोगिताओं की इतनी परतें जम गई हैं कि उसकी आर्द्रता हम तक पहुँचनी बंद हो गई है।

प्रेम को पाने की सबसे बड़ी बाधा यह नहीं है कि हम प्रेम से दूर हैं, बल्कि यह है कि हम यह पूछने से ही बचते हैं कि हमें प्रेम चाहिए क्यों?

साधारण मनुष्य परमात्मा को भी उपयोगिता की कसौटी पर कसता है। क्या मिलेगा उससे? क्या दो वक़्त की रोटी सुनिश्चित होगी? क्या मृत्यु टल जाएगी?रोज़गार मिल जाएगा? कोई अधूरी इच्छा पूरी हो जाएगी? जीवन में सुविधाएं बढ़ जाएंगी? कोई संबंध सुधर जाएगा? कोई उपलब्धि हाथ लग जाएगी?

मन बहुत चालाक है। वह ऐसे प्रश्न स्वयं से पूछता भी है और उनके उत्तर भी स्वयं ही दे देता है— “नहीं। प्रेम से इनमें से कुछ भी नहीं मिलेगा।”
और यहीं से मन निश्चिंत हो जाता है।
क्योंकि जिससे कुछ मिलना नहीं है, उसमें प्रवेश क्यों कर किया जाए? क्यों इतना उद्यम साधा जाए? क्यों अपना बहुमूल्य समय नष्ट किया जाए? क्यों मृत्यु की कला सीखी जाए?

हमारा पूरा जीवन लेन-देन की भाषा में प्रशिक्षित हुआ है। हमने देना भी इसलिए सीखा क्योंकि बदले में कुछ मिलना था। शिक्षा, श्रम, संबंध, प्रतिष्ठा, धर्म—सबके भीतर कहीं न कहीं लाभ की कोई अदृश्य गणना चलती रहती है।

ऐसे में प्रेम हमारे लिए असुविधाजनक घटना है।
क्योंकि प्रेम उस गणित को स्वीकार ही नहीं करता जिसमें देने और पाने का हिसाब रखा जा सके।
अनंत श्री कहते हैं—प्रेम जुआरियों का काम है, व्यापारियों का नहीं; शराबियों का काम है, होश वालों का नहीं; यह छलांग है, कोई गुणा-गणित नहीं।
यहाँ पहला कदम ही आखिरी कदम है।

व्यापारी पहले पूछता है—“मैं कितना लगाऊँ और कितना मिलेगा?” प्रेमी पूछता ही नहीं।
वह छलांग लगा देता है।
पर छलांग भी वानर जैसी हो सकती है और मछली जैसी भी। वानर अनुभव के पीछे भागता है, नकल करता है और उसकी छलांग कभी सार्थक परिणाम नहीं लाती। वह जो देखता है, वही दोहराता है; जो किसी और ने किया है, उसी के पीछे चलता है। उसकी छलांग में अपना कुछ नहीं होता।

मछली जैसी छलांग में कोई नकल नहीं होती। वह अपने पूरे अस्तित्व से छलांग लगाती है—न किसी अनुभव को दोहराने के लिए, न किसी उपलब्धि को पाने के लिए। उसकी छलांग अज्ञात में होती है। जीवन के लिए होती है।
वानर की छलांग स्मृति से पैदा होती है, मछली की छलांग मौलिकता से।
प्रेमी वही है जो पूछने में समय नहीं गंवाता कि आगे क्या मिलेगा; वह छलांग लगाता है और छलांग में ही अपने को दाँव पर लगा देता है।

प्रेम शब्द सुनते ही हमारी चेतना के सामने प्रायः स्त्री और पुरुष की छवि आती है।
स्त्री-पुरुष का प्रेम असत्य नहीं है। बल्कि वह प्रेम के प्रकट होने का एक सुंदर और स्वाभाविक माध्यम हो सकता है। समस्या वहाँ आरंभ होती है जहाँ माध्यम को ही सम्पूर्णता समझ लिया जाता है।

प्रेम में देहों का मिलन सुन्दर है, प्राकृतिक है, निर्दोष है पर देह प्रेम की अंतिम सीमा नहीं हो सकती।
प्रेम किसी एक व्यक्ति से प्रारंभ हो सकता है, लेकिन यदि वह वहीं समाप्त हो जाए तो वह अभी मात्र संबंध है, प्रेम नहीं।
प्रेम का स्वभाव ‘विस्तार’ है।

वह एक बिंदु से जन्म लेकर दसों दिशाओं में फैलता जाता है। एक से दूसरे तक, दूसरे से अनेक तक और अनेक से समस्त तक। इसीलिए प्रेम संख्या नहीं पूछता।
एक विवाहित पुरुष अनेक स्त्रियों से प्रेम कर सकता है—यदि प्रेम का अर्थ उनकी देहों का उपभोग नहीं, बल्कि उनके होने के प्रति एक गहरी स्वीकृति है, एक गहरा सम्मान है। तब सामने वाला “स्त्री” या “पुरुष” नहीं रह जाता; वह अस्तित्व का एक अद्वितीय रूप हो जाता है।

उसकी being ही उसके प्रेम का कारण होती है।
श्रीकृष्ण के प्रेम की कथा को केवल युवा-गोपियों की कथा बना देना इसी विराटता को संकुचित कर देना है। कृष्ण के प्रति आकर्षण की वह धारा उम्र, देह, लिंग
और सामाजिक पहचान की सीमाओं को पार करती है।

क्योंकि जहाँ प्रेम वास्तव में घटता है, वहाँ व्यक्ति धीरे-धीरे व्यक्ति नहीं रह जाता।
वह प्रकृति का जीवंत हिस्सा बन जाता है।
गहनतम संवेदनशीलता उसकी चर्या बन जाती है। ऐसी संवेदनशीलता से भरे व्यक्ति से प्रकृति सहज संवाद करती है, प्रत्युत्तर देती है, सदैव मार्ग प्रशस्त करती है।
उसके प्रेम में इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि कौन उससे कैसा व्यवहार करता है, किसका प्रतिकार करना है, किसकी अनुशंसा करनी है। वो अपने रस में डूबा है।

पूर्ववर्ती कृष्ण हों या वर्तमान में अनंत श्री—जिस प्रेम को जाना गया और जिया गया वह एक ही है, बाँटने की कला भी एक ही है।
क्योंकि प्रेम में बहाव नहीं, डुबाव है इसी कारण उसमें डूबना इतना भयावह लगता है

बहने वाला अपने को बचाए रख सकता है। वह बहुत कुछ ऐसा निर्मित कर सकता है जिसके सहारे वह बहता रहे पर डूबने वाले को स्वयं से ही स्वयं को छोड़ना पड़ता है।
अतः गहनतम प्रेम गहनतम साहस की माँग करता है।

गुरु का होना इसी अर्थ में दर्पण भी बन जाता है। ऐसा दर्पण जिसमें पहली बार साधक अपना चेहरा नहीं, अपना स्वरूप देखता है।

और प्रायः जो दिखाई देता है, वह सुखद नहीं होता।
अपना अहंकार। अपनी कुरूपता। अपनी ईर्ष्या। अपनी सीमाएँ। अपनी कृत्रिम आध्यात्मिकता। उधार का ज्ञान। दूसरों से मिली हुई पहचान। अपने बारे में गढ़ी हुई कहानी।

इन सबका सामना करना कभी-कभी किसी भी साधना से अधिक कठिन हो जाता है।
इसीलिए प्रेम भय पैदा करता है।

क्योंकि हम प्रेम से नहीं डरते; हम उस व्यक्तित्व के नष्ट होने से डरते हैं जिसे हमने अपने ऊपर ओढ़ रखा है।
प्रेम उस व्यक्तित्व को बचाने नहीं आता। वह उसे पारदर्शी करने आता है।
और जो भाग सकता है, वह भाग जाता है।
जो ठहर जाता है, उसके लिए धीरे-धीरे दर्पण भी पारदर्शी होने लगता है।

फिर गुरु दिखाई नहीं देते, शिष्य दिखाई नहीं देता, केवल एक बचता है।
गुरु और शिष्य के बीच जो दूरी थी, वह वाष्पीभूत हो जाती है।
और वहीं से प्रेम पहली बार संबंध न रहकर समष्टि की अनुभूति बनता है।

एक गुरु के सामने खड़ा खोजी वस्तुतः एक व्यक्ति नहीं होता।
वह अनेक व्यक्तियों का एक अस्थायी समूह होता है।
उसके भीतर भय है, महत्वाकांक्षा है, हीन भावना है, स्मृतियाँ हैं, अपमान हैं, इच्छाएँ हैं, मान्यताएँ हैं, असंख्य अधूरी कहानियाँ हैं।
उसकी जिह्वा तो एक है, लेकिन उसके भीतर बोलने वाले अनेक हैं।
सत्संग का अर्थ यही है कि भीतर के इन अनेक स्वरों के बीच धीरे-धीरे एक मौन जन्म लेने लगे।

जैसे, पीने वाले कहते हैं Rum के निर्मित हो जाने के बाद तब तक उसका मूल्य दो कौड़ी का होता जब तक उसे Oak की लकड़ी से बने पीपों में कुछ समय न रखा जाए इस प्रक्रिया से उसमें कत्थई रंग और एक विशेष सुगंध घुल मिल जाती है, तब उसका मूल्य बढ़ जाता है।
ऐसे ही जब तक भीतर मौन न जन्म ले ले तब तक शब्द तो एक से एक क्लिष्ट प्रयोग किए जा सकते हैं पर उनका मूल्य शून्य ही रहता है।

भीतरी मौन घट जाए तो वह दूसरों को अपने अनुसार बनाने की चेष्टा से हटकर उन्हें उनके होने में स्वीकार करना सीखता है।
अर्थात वह अनेक से एक की ओर लौटने लगता है।

सम्भवतः आध्यात्मिक यात्रा का सार भी यही है—
मनुष्य अपने भीतर जितना जोड़ता जाता है, उतना ही विभाजित होता जाता है।
ज्ञान जुड़ता है। पहचान जुड़ती है। उपलब्धियाँ जुड़ती हैं। स्मृतियाँ जुड़ती हैं।धारणाएँ जुड़ती हैं।
और इन सबके बीच “मैं” इतना भारी हो जाता है कि अस्तित्व का स्पर्श असंभव लगने लगता है।

प्रेम इसके विपरीत कुछ जोड़ता नहीं।
वह काटता है।
जो झूठा है, उसे काटता है। जो उधार है, उसे काटता है।
जो केवल भय के कारण पकड़ा हुआ है, उसे काटता है।
और अंततः उस “मैं” को भी काटने लगता है जो यह पूछता था—मुझे इससे क्या मिलेगा?

इसीलिए प्रेम को उपलब्धि कहना ही गलत है।
प्रेम में कोई उपलब्धि नहीं होती।
प्रेम में उपलब्धि का कर्ता ही धीरे-धीरे अनुपस्थित होने लगता है। और जहाँ पाने वाला नहीं बचता, वहाँ पाने को भी क्या बचता है?

गुरु का महा-प्रेम-प्रसाद किसी महासूर्य की भाँति दसों दिशाओं में फैलता है।
पर सूर्य के सामने आँखें बंद करके खड़ा व्यक्ति सूर्य को दोष नहीं दे सकता कि प्रकाश नहीं मिला।

गुरु का मिलना महान सौभाग्य है पर महानतम सौभाग्य यह है कि गुरु की उपस्थिति में हम अपनी धारणाओं को थोड़ी देर के लिए किनारे रख सकें।
अपने झूठे ज्ञान को। अपनी बनाई हुई आध्यात्मिक छवि को। अपने अनुभवों के अहंकार को।
अपने शास्त्रों की सुरक्षा को। अपनी भावुकताओं को।

और तब जो शेष बचता है, उसके सामने पहली बार संभव होता है—स्वयं को देखना।
और यही प्रच्छन्न भगवत्ता का पहला साक्षात्कार है।
तब गुरु के साथ संबंध भी बदल जाता है। गुरु अपेक्षा नहीं, उपस्थिति हो जाते हैं। पकड़ नहीं, गहरी स्वीकृति हो जाते हैं। आश्रय नहीं, आकाश हो जाते हैं।

और अंततः मनुष्य के रूप में दिखाई देने वाले गुरु उस सत्ता की ओर संकेत करने लगते हैं जिसे हम परमात्मा कहते आए हैं। अनंत श्री बैसाखियां नहीं देते, कभी अपने से नहीं बाँधते। बल्कि शिष्य की बुद्धि को ही प्रकाश से भर देते हैं और उस शिष्य को पूरी प्रकृति ही गुरु के स्वरूप में बोध से भरना शुरू कर देती है।

तब प्रश्न यह नहीं रहता कि गुरु ने क्या दिया।
प्रश्न यह भी नहीं रहता कि मैंने क्या पाया।
क्योंकि पाने और देने वाला जो द्वैत था, वही ढहने लगता। और वही वह क्षण है—
जब गुरु से प्रेम, गुरु तक सीमित नहीं रहता।
वह अन्य अन्य मार्गों से पूरी प्रकृति में फैलने लगता है।

जब प्रेम व्यक्ति से उठकर अस्तित्व में फैल जाता है।
जब सामने वाला कोई “दूसरा” नहीं रह जाता।
जब मृत्यु का भय भी अपनी जड़ खोने लगती है।
जन्म ही यदि अंतिम सत्य नहीं, तो मृत्यु किसकी?
और यदि मृत्यु की सत्ता ही संदिग्ध हो जाए—
तो भय किसका?

यही वह द्वार है जहाँ से वापसी नहीं होती।
इसलिए नहीं कि कोई बाहर जाने का रास्ता बंद कर देता है,
बल्कि इसलिए कि लौटने वाला “मैं” ही अब पहले जैसा नहीं बचता।
यही प्रेम की दृष्टि से दिखने वाला point of no return है।

बोधि माँ व अनंत श्री को समर्पित।

Leave a Reply