गुरु जी और बोधि मां को मेरा देखना, देखना दो बुद्धों को, एक पूर्ण संबंध को जिसमें वेदना, वेद और प्रेम तीनों होते हैं और देखना उस रहस्य को जो मित्रों के भीतर उतर रहा है…
जा, तुझे इश्क हो जाए — और दिल का टूटना भी जरूरी है, ऐसे वाक्य,
अतीत के संतों ने यह यूँ ही नहीं कहा।
यह एक आध्यात्मिक यात्रा है—जहाँ वेदना और वेद एक-साथ चलते हैं।
और जब वेदना का विस्तार चरम पर पहुँचता है,
तभी प्रेम भी अपने चरम पर खिलता है।
वेदना प्रेम का ही दूसरा रूप है या कहें प्रेम का विस्तार है,
प्रेम जितना गहरा होता है,
वेदना उतनी ही तीव्र होकर उसे गढ़ती है।
जब हम बुद्धों के साथ लयबद्ध होते हैं,
तो वेद और वेदना दोनों भीतर घटने लगते हैं।
वेदना, बंद दिलों की दीवारों में
धीरे-धीरे खिड़कियाँ बनाती है—
जहाँ भीतर दफन एक रोशनी बाहर झाँकने लगती है।
वेद से उत्पन्न प्रेम—या कहें प्रेम से जन्मा वेद—
उन खिड़कियों से प्रकाश बनकर निकलता है।
और जैसे-जैसे हम बुद्धों के साथ धड़कने लगते हैं,
यह प्रकाश सघन होता जाता है,
हमारे अंतरतम को उजाला देता हुआ।
परंतु कभी-कभी,
जब कोई बुद्ध काया से कायनात हो जाता है
और हमें गहराई से स्पर्श कर देता है,
तब दिल की दीवारें एक झटके में ढह जाती हैं।
उस क्षण वेदना अत्यंत गहरी होती है—
पर उसी गहराई में वह दफन रोशनी
पूरी तरह हमें आच्छादित कर देती है।
हम उस बुद्ध की रोशनी के साथ एक हो जाते हैं,
उसकी धड़कन के साथ स्पंदित होने लगते हैं,
और वह रोशनी हमारी अंतर्निहित शाश्वतता बन जाती है।
फिर उसी रोशनी से
उस पथ पर आने वाला हर मित्र
अपना मार्ग पाता है।
