जीवन बड़ी ही रहस्यमय और प्रेमपूर्ण यात्रा है। न जाने कौन से कायनाती अनुभव और स्मृतियाँ हमारे जीवन की प्रत्येक घटना में लिपटे होते हैं। ये स्मृतियों और अनुभवों के धागे कब हमारे जीवन को बुन डालते हैं, हमें पता ही नहीं चलता।
ऐसी ही एक बहुत प्यारी स्मृति इस समय मेरे भीतर से उभर रही है और मेरे पूरे वजूद को घेर रही है।
यह 1986 का साल है, मैं, पति और बच्चों के साथ गोवा घूमने गयी हूँ, बच्चे अभी बहुत छोटे हैं, न जाने क्यों खुश भी हूँ और उदास भी। जीवन में कोई कमी नहीं है, लेकिन फिर भी कोई अतृप्ति है जो साँसों से लिपटी हुई है।
समंदर के असीम जल को देखते हुए जाने क्यों आँखें नम हो रही हैं, लग रहा है कि ऐसा ही कुछ विराट और असीम मुझे बुला रहा है। यह भाव इतना अजीब है कि मैं जोर-जोर से रोना चाह रही हूँ, और ऐसा भी लग रहा है कि वो असीम कहीं आसपास ही है। इस भाव के साथ दिल एक अनजानी खुशी में जोर-जोर से धड़क रहा है। बाहर से मैं पूरी तरह सामान्य दिख रही हूँ, किसी को पता नहीं कि मेरे भीतर कैसा तूफ़ान चल रहा है।
अगले दिन हम मुंबई जा रहे हैं, मुंबई की किसी जगह पर यह सुमिला नाम का घर है। ओशो अमेरिका से आने के बाद यहाँ ठहरे हैं, मेरे पति ओशो के प्रेम में डूबे हैं, वो मुझे भी उनसे मिलवाना चाहते हैं। ओशो का प्रवचन शुरू होने वाला है, बच्चे छोटे हैं इसलिए मुझे अन्दर नहीं जाने दिया जा रहा है, पता चला है कि ओशो जिस गैलरी से आते जाते हैं वहां एक खिड़की है, जिससे मैं उन्हें देख सकती हूँ।
मेरे भीतर इस समय सब ठहरा हुआ सा है, एक शांति है, जो शायद तूफ़ान आने के पहले होती है। ओशो का प्रवचन अब समाप्त होने को है, मैं बच्चों को एक गार्ड के पास छोड़कर, गैलरी में खुलने वाली खिड़की के पास आकर खडी हो गयी हूँ, मेरा दिल तेजी से धड़क रहा है और पूरे शरीर में कंपकंपाहट सी हो रही है।
कुछ हलचल से हुई आसपास की हवा बदलने लगी, किसी का हाथ कोमलता से पकडे हुए ओशो गैलरी में मुड़ रहे हैं लहराती हुई सफेद दाढी और लहराते हुए वस्त्र, वो करीब आते जा रहे हैं, मेरा पूरा शरीर मूर्तिवत हो गया है और मैं बस देखना मात्र रह गयी हूँ।
ओशो खिड़की के ठीक सामने आ गए हैं, पल भर को हमारी आँखें मिलीं, वो मुस्कुरा दिए मुझे देखकर मुझे लग रहा है कि इस मुस्कान से मेरी बहुत पुरानी पहचान है। ओशो आगे बढ़ गए हैं और मैं महसूस कर रही हूँ कि वो मेरे भीतर चलते जा रहे हैं, मेरे भीतर एक तूफ़ान सा मचल रहा है, ऐसा लग रहा है कि समय ठहर गया है।
मेरे पति मेरे पास आकर खड़े हो गए हैं, मैं उन्हें पकड़कर बहुत रो रही हूँ, ओशो को एक बार और देखना चाह रही हूँ, कोई कह रहा है कि कल वह पूना चले जाएँगे, लेकिन सुबह सात बजे उनसे मिल सकते हैं, हम अगली सुबह आने का मन में तय करके वापस लौट रहे हैं।
सुमिला की गैलरी में खुलने वाली खिड़की की तरह मेरे भीतर भी जैसे कोई खिड़की खुल गयी है, मेरे भीतर की खिड़की से ओशो की आँखें और उनकी मुस्कान मुझे कुछ याद दिलाने की कोशिश कर रही है, मुझे लग रहा है कि ओशो इस दुनिया के इंसान नहीं हैं, कोई इंसान ऐसा दिव्य भी हो सकता है, मुझे यकीन नहीं हो रहा है।
अगली सुबह हम सात बजे से पहले ही सुमिला पहुँच गए हैं। वहां पता चल रहा है कि ओशो चार बजे भोर में ही पूना चले गए हैं, मैं वहीं बैठ गयी हूँ, ऐसा लग रहा है कि जीवन हाथ से फिसल गया है। उनसे दुबराना मिल पाने की तड़प है, मैं रो रही हूँ, एक कसक अंतर्मन में प्रवेश कर किसी धारदार चाकू की तरह मेरे अस्तित्व को परत दर परत काट रही है।
उसके बाद हम अक्सर पूना जाते रहे और ओशो से मिलते रहे, साधना भी चलती रही है, लेकिन अब अतृप्ति का एहसास और गहरा हो रहा है, ह्रदय में जाने कौन सी प्रतीक्षा है, ऐसा लगता है कि आँखें किसी को ढूंढ रही हैं।
ओशो ने 1990 में शरीर छोड़ दिया है। एक विशाल खालीपन जीवन में उतर आया है, जीवन चलता जा रहा है। हम लोग 1992 में पता नहीं क्यों लखनऊ आ गए हैं। चेतना जगत के नए आयाम खुलने प्रारंभ हो गए हैं, लेकिन जीवन में कुछ कमी सी है, और बिना किसी बात के आँखों में एक नमी सी है।
लखनऊ में अपना घर बन गया है। घर में सब ठीक है लेकिन कभी-कभी उदासी के बादल घिर आते हैं और आँखों से बरस जाते हैं। एक दिव्य मुस्कान वाला चेहरा आजकल मेरे अंतर्मन में उभरता रहता है।
अब एक और स्मरण अंतर्मन में उठ रहा है,
यह 2008 का साल है, अगस्त महीने का अंतिम दिन दिन है, मेरे पति कहीं एक दिवसीय ध्यान शिविर में गए हैं। आज फिर से वैसी ही तड़प और बेचैनी मुझे घेर रही है जैसी ओशो के मिलने के पहले हुई थी। ये वापस आये हैं और बता रहे हैं कि सद्गुरु अनंत श्री का शिविर था, बहुत अच्छा लगा है। इनको अगले दिन फिर कहीं अनंत श्री का कार्यक्रम है, मेरे अंतर्मन से वहाँ जाने की पुकार उठ रही है, प्राणों में एक खिंचाव सा है।
अगले दिन एक फ्लैट में अनंत श्री का ध्यान और प्रवचन होने वाला है। हम लोग पहले से ही वहां पहुँच गए हैं, मुझे आगे ही बैठने की जगह मिल गयी है। अनंत श्री आएं हैं और उनके आते ही सारा वातावरण उल्लास से भर गया है, मुझे ठीक सुमिला जैसा अनुभव हो रहा है, लग रहा है कि ओशो ही देह बदलकर आ गए हैं, मेरी आँखों में आनंद और अहोभाव के आँसू छलक आये हैं।
अनंत श्री की मधुर वाणी जो उस दिन वहाँ गूँज रही थी आज भी मेरे ह्रदय में अंकित है –“ सद्गुरु कोई सीढी नहीं है, उसे सीढी समझने की भूल न करना तुम्हे कहीं पहुँचने के लिए सीढियां चाहिए इसीलिए तुम्हे वो सीढी दिखाई देता है। संसार में तो तुम्हारे सारे संबंध अपनी वासनाओं को पूरा करने की सीढियां मात्र हैं, लेकिन जब तुम संसार से ऊबते हो तो भी कुछ पाना चाहते हो, चाहे वो परमात्मा हो, आत्मज्ञान हो, बोध हो या शून्यता हो। जब भी तुम्हारा चित्त पाने और कहीं पहुँचने की वृत्ति से भरा होता है तुम सीढी की तलाश करते हो, सद्गुरु को भी ऐसे ही लोगों ने सीढी की तरह देखा।
सद्गुरु की उपस्थिति में तुम्हारा यह कहीं न कहीं पहुँचने की कोशिश करने वाला चित्त और कुछ न कुछ उपलब्ध करने की कोशिश करने वाला चित्त विलीन हो जाता है, तुम वहीँ हो जहाँ तुम होना चाहते हो, तुम वही हो जो तुम होना चाहते हो, यह देख लेना ही बोध है। सद्गुरु इस दर्शन में तुम्हारी सहायता करता है और जब तुम देख लेते हो तो तुम सारी नादानी पर हँस पाते हो, यह बोध तुम्हारी कल्पित सीमाओं को समाप्त कर देता है, अब तुम्हारे और सद्गुरु के बीच कोई सीमा नहीं रह जाती, अब उसे न भूलने की जरुरत है न याद रखने की, न उसे पकड़ने की और न छोड़ने की, जो सहज ही घटता है तुम उसके साथ बहते हो”।
“सद्गुरु तुम्हारा ही प्रकाशित हिस्सा है, जो धीरे-धीरे सारे हिस्सों को प्रकाशित कर देता है। इस प्रकाश में अब कोई विभाजन नहीं रहता, न तुम रहते और न गुरु रहता, रह जाता है बस एक शाश्वत प्रकाश जो अनेक-अनेक रूपों में अभिव्यक्त होता रहता है।”
इन अद्भुत शब्दों में डूबते उतराते मैं देख रही हूँ कि यह तो वही दिव्य मुस्कान वाला चेहरा है जो अक्सर मेरे भीतर उभरता रहा है। मैं आश्चर्यचकित होकर अनंत श्री नाम की देवताओं की इस साजिश को देख रही हूँ। अनंत श्री से मिलकर ऐसा लग रहा है जैसे मैं खुद से ही मिल रही हूँ। वक़्त एक बार फिर ठहर गया है, अब समझ में आ रहा है कि अस्तित्व मुझे लखनऊ क्यों ले आया।
अब सारी धुंध छंट रही है, अनंत श्री के पास जाना अक्सर होने लगा है, ऐसा लग रहा है कि मैं अपने घर वापस लौट आयी हूँ। जीवन का अर्थ, मर्म और रहस्य मुझे हर और से घेर रहा है। अब मैं किसी तलाश में नहीं हूँ, कुछ पाने की या कुछ होने की सब बातें गिर गयी हैं, मैं मिट सी रही हूँ।
मैं अपने पति (सत्य भारती जी) की इतनी शुक्रगुजार हूँ कि शब्दों में नहीं कहा जा सकता। उन्होंने इस शताब्दी के दो अनूठे सदगुरुओं से मुझे मिलवाया है। उनके बिना न मैं ओशो से मिल पायी होती और न अनंत श्री से। एक सदेह बुद्ध के साथ होना परम सौभाग्य है, एक सदेह बुद्ध का होना अतुलनीय है, उसको देख पाना, सुन पाना, उसके साथ हँस पाना, रो पाना और उस हवा में सांस ले पाना जिसमें वो भी साँसें ले रहा होता है,कितना अलौकिक है।
बुद्धों को कुछ कहना नहीं होता, वो तो बस एक खामोशी का उत्सव होते हैं, बस होना मात्र। ये हम ही हैं जो उनकी खामोशी की झील में अपनी जिज्ञासा का कंकड़ उछाल देते हैं, और तब फिर खामोशी की करुणा शब्द-शब्द होकर हमारे चारों ओर अमृत कणों सी तरंगित होती रहती है।
जीवन इस शाश्वत पल में ही बहता और बसता है। अनंत श्री हमेशा कहते हैं कि जीवन अनिश्चित और असुरक्षित है, और इसे निश्चित व सुरक्षित बनाने का हर प्रयास मनुष्य को तनाव, चिंता और अंधविश्वासों की भूलभुलैयाँ में उलझा देता है। उनके सान्निध्य में रहते हुए मैंने इस अनिश्चित और असुरक्षित जीवन के रहस्य को जीना सीखा है।
अनंत श्री कहते हैं कि जीवन जीने का सबसे सरल और सुन्दर ढंग यही है कि “रात को सोते समय ऐसे सोओ जैसे कि यह रात अंतिम है, पता नहीं सुबह होगी या नहीं और सुबह जब जागो तब ऐसे जागो कि यह कितना बड़ा चमत्कार है”। जो यह दिन फिर से मिला है और इसके लिए समस्त अस्तित्व के प्रति अनुग्रह से भर जाओ, पूरे दिन प्रत्येक पल को एक अप्रतिम उपहार व चमत्कार जानकर जियो, यह जीवन दृष्टि हमें कितना सहज बनाती है।
You are such a enlightened soul.