शिवलिंग ध्यान की गहरी से गहरी अवस्था का प्रतीक है. जब कोई ध्यान की ऐसी अवस्था में होता है जहाँ आंतरिक स्थिरता और मौन एक दूसरे में घुल गए होते हैं तब उसका आकार शिवलिंग जैसा, ऊपर उठती दिए की लौ की तरह है, जो कि कामऊर्जा के ऊपर उठकर रूपांतरित होने का संकेत है.
यहाँ प्रतीक तो काम का है – देवी की योनि और शिव का लिंग, लेकिन ये गहरे से गहरे प्रेम को दर्शाता है जिसमें द्वैत खो गया है. ऊर्जा तो वही है लेकिन ये प्रेम की यात्रा में है जो कि दिए की लौ जैसी यात्रा है जिसमें प्रकाश भी है और अशुद्धियों को जलाकर समाप्त करने की निरंतर प्रक्रिया भी.
ये प्रेम का गहरे से गहरा प्रतीक है जिसमें अनन्य समर्पण है, अखंड प्रतिबद्धता है, गहन संवेदनशीलता है और इतना गहरा भाव कि देवी और शिव दो नहीं रह गए हैं और एक होकर एक ज्योति कि तरह ऊपर उठ रहे हैं. शिवलिंग इसी गहनतम प्रेम का स्मरण दिलाने के लिए गढ़ा गया भारतीय मनीषा के द्वारा. और जहाँ ऐसा प्रेम घट जाये वहां ध्यान और समाधि तो सहज ही घट जाते हैं. इसीलिए तो शिव देवी के प्रेम के प्रत्युत्तर में सहज ही ध्यान के समस्त सूत्र विज्ञान भैरव तंत्र के रूप में दे गए.
कामऊर्जा विकृत हो जाती है जब अनन्य समर्पण और प्रतिबद्धता न हो, जहाँ अपने सुख के लिए शोषण या पारस्परिक शोषण की वृत्ति हो. शिवलिंग इसी विकृति से पार ले जाने का प्रतीक है. ये प्रेम के आयाम में गति का प्रतीक है जहाँ सुख पाने की चाह नहीं है वरन सुख-दुःख के पार आनंद, शांति और अद्वैत की सहज अवस्था में प्रवेश है…
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सादर प्रणाम सद्गुरु 🌴🌾🥀💓🪷💓🪷💓😊🙏🏻🥀🥀🥀
Atit mein bhartiya Mani Rishi ne ananya prem ka jo deepak jalaya hai ek sadguru ki upasthiti mein vah sada hi prajwalit hai. 🌹🌹🙏