अपने जीवन के अंतिम काल में एक बार भगवान् बुद्ध भिक्खु आनंद के साथ एक जंगल में विचरण कर रहे थे. पतझर का वक़्त था. जंगल की जमीन सूखे पत्तों से ढकी थी. भगवान् बुद्ध ने टहलते हुए एक मुट्ठी पत्ते उठाये और आनंद से बोले – “आनंद, मैंने जो कुछ बोला है, वो बस इन एक मुट्ठी पत्तों जैसा है. जो अनकहा रह गया है वो धरती के समस्त जंगलों में फैले पत्तों की तरह है. और कुछ है जिसे कहा ही नहीं जा सकता.”
अपार ज्ञान से एक मुट्ठी ज्ञान की प्राप्ति किसी दूसरी मुट्ठी में सिमट आये ज्ञान में मिलकर, और समृद्ध हो जाने के लिए होती है. यह प्राप्ति आपस में टकराने के लिए नहीं होती है. अपनी-अपनी मुट्ठियाँ बंदकर अहंकार और क्रोध की अग्नि में जलना, इस ज्ञान की प्राप्ति का ऐसा उपयोग है जिसमें हर प्राप्ति राख हो जाती है.
शास्त्रार्थ ऐसी ही अहंकार मूलक प्रक्रिया है जिसमें हार-जीत की चट्टानों के नीचे दबकर चेतना का कोमल फूल मर जाता है. इन्हीं चट्टानों से ज्ञान की नदियों का बहाव अवरुद्ध हो जाता है. नदियाँ सूख जाती हैं. जो नदियाँ आपस में मिलकर महासागर हो सकती थीं, वो शास्त्रार्थ से उपजी हार-जीत, अहम्-क्रोध और ईर्ष्या-ग्लानि आदि की चट्टानों से इस तरह पट जाती हैं कि अपना वजूद ही खो बैठती हैं.
इतिहास इस तरह के हवालों से भरा पड़ा है. अतीत से लेकर वर्तमान तक अपार ज्ञान की मुट्ठी भर प्राप्ति जब भी दूसरी मुट्ठी भर प्राप्ति से मिल जाने के बजाय टकराई है, तब दुःख और अँधेरे का एक अध्याय मनुष्यता के इतिहास में जुड़ गया है.
ज्ञान हार-जीत का नाम नहीं है. वह सही या गलत भी नहीं है. वह छोटा या बड़ा भी नहीं है. वह तो सहज स्वीकार की मिट्टी में अलग-अलग मुट्ठियों की प्राप्ति के जल से सींचा गया व दुलराया गया, चेतना का वो बीज है, जिसकी खिलावट से सारा जगत भर जाता है.
My mystic seer …I have read about this incident elsewhere too .but reading this here has transported me to back and beyond as if the whole incident of the past is happening now … in my presence
The magnanimity of the experience has withdrawn my senses within
Gratitude Master
❤❤❤
Gratitude!!!!!💚
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