प्रेम भी एक अचार की तरह पकता है- Inner Reflection Of Anant Sangha…
प्रेम भी एक अचार की तरह पकता है- Inner Reflection Of Anant Sangha…
प्रेम भी एक अचार की तरह पकता है गुरु जी कहते हैं—प्रेम को समझना और उसका खिलना, अचार के पकने जैसा है। अचार को बनाया तो एक दिन में जा सकता है, लेकिन उसका असली स्वाद एक दिन में नहीं आता। उसे समय देना पड़ता है। धूप चाहिए, प्रतीक्षा चाहिए, भीतर चल रही एक धीमी-सी प्रक्रिया के प्रति भरोसा चाहिए। धीरे-धीरे उसमें खुशबू आती है, उसका अपना स्वाद विकसित होता है और फिर एक दिन वह वैसा नहीं रहता जैसा शुरुआत में था। प्रेम भी ऐसा ही है। किसी संबंध का आरंभ हो जाना प्रेम का परिपक्व हो जाना नहीं है।
प्रेम को भी समय चाहिए—एक-दूसरे को समझने का, जानने का, देखने का, और बिना जल्दबाजी के उस संबंध को अपनी गति से खिलने देने का। और केवल समय ही पर्याप्त नहीं है, ध्यान भी चाहिए। जैसे अचार को अगर गीले या गंदे हाथों से बार-बार छू दिया जाए तो उसमें फफूंद लग सकती है, उसी तरह प्रेम जब अपने भीतर पक रहा हो, तब उसमें हमारी अधीरता, अपेक्षाएँ, भय, संदेह और अधिकार का हस्तक्षेप भी उसे खराब कर सकता है। इसलिए प्रेम को पकड़ना नहीं है, उसे पकने देना है। बार-बार यह पूछना कि “तुम मुझसे कितना प्रेम करते हो?”, “यह संबंध कहाँ जा रहा है?”, “मुझे अभी क्या मिल रहा है?”—कभी-कभी प्रेम को उसकी स्वाभाविक यात्रा से हटा देता है। प्रेम को भी थोड़ी धूप चाहिए, थोड़ी दूरी चाहिए, थोड़ी नमी और बहुत सारी सजगता चाहिए। जल्दबाजी प्रेम को गहरा नहीं करती; कई बार उसकी कच्ची अवस्था को ही तोड़ देती है। इसलिए संबंध में होना केवल साथ रहना नहीं है।
संबंध में होना यह सीखना भी है कि कब बोलना है, कब चुप रहना है, कब पास जाना है और कब प्रेम से दूसरे को उसकी अपनी जगह देनी है। जब प्रेम को पर्याप्त समय, समझ और ध्यान मिलता है, तब वह धीरे-धीरे अपना स्वाद प्रकट करता है। और तब प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध नहीं रह जाता— वह एक ऐसी सुगंध बन जाता है, जो दोनों के होने से स्वयं फैलती है।
प्रेम का जीवन में उतरना गुरु जी कहते हैं—प्रेम अपने में पूर्ण है। प्रेम को पूर्ण होने के लिए किसी दूसरे की स्वीकृति, किसी संबंध की मुहर या किसी भविष्य की गारंटी की आवश्यकता नहीं है। प्रेम अपने आप में एक पूर्ण अनुभव है। लेकिन जब यही प्रेम हमारे जीवन में उतरता है, जब हम किसी के साथ रहने लगते हैं, किसी को जानने लगते हैं, किसी के सुख-दुःख में सहभागी होते हैं, तब वह प्रेम एक प्रक्रिया से गुजरता है। प्रेम पूर्ण है, लेकिन उसका जीवन में प्रकट होना धीरे-धीरे घटता है। इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे अचार। अचार बनने की संभावना उसमें पहले से होती है। लेकिन उसका स्वाद, उसकी खुशबू, उसकी परिपक्वता—ये सब समय के साथ प्रकट होते हैं। उसी तरह प्रेम भी अपने में पूर्ण है, लेकिन जब वह संबंधों में उतरता है, तो उसे जीवन के अनुभवों से गुजरना पड़ता है। साथ रहना, एक-दूसरे को समझना, मतभेदों को देखना, कभी पास आना, कभी दूरी का अनुभव करना—इन सबके बीच प्रेम अपने को और स्पष्ट करता है। इसलिए प्रेम को पूर्ण बनाने की कोशिश नहीं करनी है, बल्कि उसके पूर्ण होने को जीवन में प्रकट होने देना है। और यही वह जगह है जहाँ धैर्य और ध्यान आवश्यक हो जाते हैं। जैसे अचार को पकने के लिए समय चाहिए, वैसे ही प्रेम को भी अपने जीवन में गहराने के लिए समय चाहिए। लेकिन समय के साथ-साथ यह भी देखना होता है कि हम उस प्रेम के साथ क्या कर रहे हैं। क्या हम उसे अपनी अपेक्षाओं से ढक रहे हैं? क्या हम उसे अपने भय से नियंत्रित कर रहे हैं? क्या हम उसे जल्दी किसी निष्कर्ष तक पहुँचाना चाहते हैं? या हम उसे समझने, जीने और खिलने की जगह दे रहे हैं? प्रेम को जीवन में उतारना, प्रेम को बदलना नहीं है; प्रेम के साथ अपने जीवन को बदलने देना है। तब संबंध केवल प्रेम पाने का माध्यम नहीं रह जाता। वह एक ऐसी जगह बन जाता है जहाँ हम अपने भीतर की अधीरता, अपने अधिकार, अपनी असुरक्षा और अपनी अपेक्षाओं को भी देख सकते हैं। और धीरे-धीरे समझ में आता है कि प्रेम का परिपक्व होना केवल दूसरे के साथ संबंध का परिपक्व होना नहीं है—यह हमारे अपने होने का भी परिपक्व होना है। इसलिए प्रेम को जल्दबाजी में किसी नाम, किसी परिणाम या किसी निष्कर्ष तक पहुँचाने की आवश्यकता नहीं है। उसे समय दें, ध्यान दें, समझ दें। प्रेम अपने में पूर्ण है। जीवन में उसका खिलना—अचार के पकने की तरह—एक धीमी, सुंदर और सजग यात्रा है।