understanding the another dimension of love…

अनंत श्री कहते हैं मनुष्य के जीवन में प्रेम केवल दो व्यक्तियों का मिलना नहीं है। प्रेम के भीतर कई परतें होती हैं—आकर्षण, चाहत, अपनापन, भय, अपेक्षाएँ, समर्पण, स्वतंत्रता और अंततः स्वयं को जानने की यात्रा।

अक्सर हम किसी व्यक्ति की ओर आकर्षित होते हैं और सोचते हैं कि हम उसे खोज रहे हैं, लेकिन कई बार गहराई से देखने पर पता चलता है कि हम अपने भीतर के किसी अधूरे हिस्से को खोज रहे होते हैं। यहीं स्त्रैण और पुरुष रहस्य प्रेम और संबंधों में प्रवेश करते हैं। आकर्षण का रहस्य- आकर्षण केवल शरीर का विषय नहीं है। कभी-कभी हमें किसी व्यक्ति की मुस्कान आकर्षित करती है, कभी उसकी शांति, कभी उसकी स्वतंत्रता और कभी उसकी ऊर्जा। लेकिन प्रश्न यह है— हम किसी व्यक्ति की ओर आकर्षित क्यों होते हैं? कई बार हम उस व्यक्ति में वह गुण देखते हैं जो हमारे भीतर दबा हुआ है।

जो व्यक्ति बहुत तर्कशील है, वह किसी सहज और भावनात्मक व्यक्ति की ओर आकर्षित हो सकता है। जो व्यक्ति बहुत भावनात्मक है, वह किसी स्थिर और जागरूक व्यक्ति की ओर आकर्षित हो सकता है। जो व्यक्ति हमेशा दूसरों के लिए जीता रहा है, वह किसी स्वतंत्र व्यक्ति को देखकर आकर्षित हो सकता है। इस प्रकार आकर्षण कई बार केवल दूसरे व्यक्ति के प्रति नहीं होता, बल्कि अपने भीतर छिपी संभावनाओं के प्रति भी होता है।

स्त्रैण ऊर्जा और प्रेम- स्त्रैण चेतना प्रेम में निकटता चाहती है। वह महसूस करना चाहती है। वह जुड़ना चाहती है। वह अपने भीतर की बात साझा करना चाहती है। वह चाहती है कि उसे केवल सुना न जाए, बल्कि समझा भी जाए। स्त्रैण ऊर्जा के लिए प्रेम का अर्थ केवल साथ रहना नहीं है। प्रेम का अर्थ है— “मैं तुम्हारे सामने स्वयं को छिपाए बिना रह सकता हूँ।” जहाँ व्यक्ति अपने भय, कमजोरियाँ, आँसू और सच्चाई छिपाने के लिए मजबूर नहीं होता, वहाँ संबंध की एक गहरी संभावना जन्म लेती है। लेकिन स्त्रैण ऊर्जा का एक खतरा भी है। कभी-कभी प्रेम में जुड़ने की इच्छा इतनी अधिक हो जाती है कि व्यक्ति स्वयं को ही खो देता है। वह सोचने लगता है— “यदि तुम मुझे छोड़ दोगे तो मैं अधूरा हो जाऊँगा।” यहीं प्रेम धीरे-धीरे निर्भरता में बदल सकता है। सच्चा प्रेम दूसरे से जुड़ना सिखाता है, लेकिन स्वयं से अलग होना नहीं।

पुरुष ऊर्जा और प्रेम- पुरुष चेतना संबंध में स्थिरता और स्पष्टता लाती है। वह पूछती है— हमारे संबंध की वास्तविकता क्या है? हम एक-दूसरे से प्रेम करते हैं या केवल एक-दूसरे की आदत बन चुके हैं? हम साथ इसलिए हैं क्योंकि हम स्वतंत्र होकर भी साथ रहना चाहते हैं, या इसलिए क्योंकि अकेले होने से डरते हैं? पुरुष चेतना संबंध में देखने की क्षमता लाती है। कभी-कभी प्रेम के नाम पर व्यक्ति बहुत कुछ सहता रहता है, लेकिन उसके भीतर लगातार पीड़ा बढ़ती रहती है। साक्षीभाव पूछता है— क्या यह प्रेम है या भय? क्या यह समर्पण है या आत्म-विस्मृति? क्या यह साथ है या निर्भरता? यहीं पुरुष रहस्य संबंध को जागरूकता देता है। लेकिन यदि यह पक्ष अत्यधिक बढ़ जाए और हृदय पीछे छूट जाए, तो व्यक्ति संबंध को केवल विश्लेषण करने लगता है। वह प्रेम को महसूस करने के बजाय लगातार उसकी जाँच करने लगता है। इसलिए केवल समझना पर्याप्त नहीं है। प्रेम को अनुभव भी करना पड़ता है।

प्रेम में स्त्रैण और पुरुष का मिलन एक गहरा और स्वस्थ संबंध वहाँ जन्म लेता है जहाँ— एक व्यक्ति महसूस कर सकता है और दूसरा उसे सुन सकता है। एक व्यक्ति टूट सकता है और दूसरा उसे ठीक करने की जल्दी किए बिना उसके साथ रह सकता है। एक व्यक्ति अपनी स्वतंत्रता जी सकता है और दूसरा उसे नियंत्रित करने की कोशिश नहीं करता। वास्तव में यह किसी स्त्री और पुरुष की निश्चित भूमिका नहीं है। कभी एक व्यक्ति संवेदनशील पक्ष में होता है और दूसरा स्थिरता देता है। कभी परिस्थितियाँ बदलती हैं और भूमिकाएँ भी बदल जाती हैं। इसलिए स्त्रैण और पुरुष रहस्य को संबंधों के नियम के रूप में नहीं, बल्कि दो आंतरिक गुणों के संतुलन के रूप में समझना चाहिए। प्रेम का सबसे बड़ा भय अक्सर प्रेम खोना नहीं होता। गहराई से देखें तो भय होता है— “यदि दूसरा चला गया तो मेरा क्या होगा?” यहीं व्यक्ति दूसरे को पकड़ना शुरू करता है। पकड़ने से नियंत्रण आता है। नियंत्रण से भय बढ़ता है। भय से संबंध में तनाव आता है। और धीरे-धीरे वही व्यक्ति, जिसे हम प्रेम के कारण पकड़ना चाहते थे, हमारी पकड़ से दूर होने लगता है। स्त्रैण रहस्य कहता है— प्रेम में खुलो। पुरुष रहस्य कहता है— लेकिन जागरूक रहो कि तुम्हारा प्रेम भय में न बदल जाए। प्रेम में दो शब्द अक्सर विरोधी लगते हैं— समर्पण और स्वतंत्रता। लेकिन वास्तविक प्रेम में दोनों साथ हो सकते हैं।

समर्पण का अर्थ है— मैं तुम्हारे सामने अपने हृदय को खुला रखता हूँ। स्वतंत्रता का अर्थ है— लेकिन मैं स्व को तुम्हारे अधिकार में नहीं देता। वास्तविक गुरु स्व को खिलने देता है। प्रेम में किसी को अपना कहना सुंदर हो सकता है। लेकिन किसी को अपनी संपत्ति समझना प्रेम का अंत हो सकता है। एक स्वस्थ संबंध कहता है— मैं तुम्हारे साथ हूँ क्योंकि मैं तुम्हें चुनता हूँ, इसलिए नहीं कि तुम्हारे बिना मेरा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। स्व का मिलन क्या है? स्व का मिलन केवल दो व्यक्तियों का निकट आना नहीं है। दो शरीर पास हो सकते हैं, लेकिन दो मन बहुत दूर हो सकते हैं। दो व्यक्ति वर्षों तक साथ रह सकते हैं, लेकिन एक-दूसरे को कभी वास्तव में देख नहीं सकते। स्व का मिलन तब शुरू होता है जब हम दूसरे व्यक्ति को अपनी इच्छाओं के अनुसार बदलने की कोशिश कम करते हैं और उसे वास्तव में देखना शुरू करते हैं। उसे जैसा होना चाहिए, वैसा नहीं। बल्कि जैसा वह वास्तव में है, वैसा। यह देखना आसान नहीं है। क्योंकि अक्सर हम दूसरे व्यक्ति को नहीं देखते। हम उसके ऊपर अपनी कल्पनाएँ देखते हैं। हम चाहते हैं कि वह हमारे अनुसार प्रेम करे। हमारे अनुसार बोले। हमारी अपेक्षाओं के अनुसार चले। लेकिन जहाँ अपेक्षाएँ समाप्त होती हैं, वहाँ पहली बार वास्तविक देखने की शुरुआत हो सकती है।

संबंध एक दर्पण है हर गहरा संबंध हमारे लिए एक दर्पण बन सकता है। जब कोई व्यक्ति हमें क्रोधित करता है, तब केवल दूसरा व्यक्ति ही दिखाई नहीं देता। हमारे भीतर का क्रोध भी दिखाई देता है। जब कोई हमें छोड़ने का भय देता है, तब हमारे भीतर की असुरक्षा दिखाई देती है। जब किसी की सफलता हमें परेशान करती है, तब हमारे भीतर की तुलना दिखाई देती है। इस प्रकार संबंध केवल दूसरे व्यक्ति को जानने का माध्यम नहीं है। संबंध स्वयं को जानने का भी अवसर है। स्त्रैण चेतना उस अनुभव को महसूस करती है। पुरुष चेतना उस अनुभव को देखती है। और जब दोनों साथ आते हैं, तब संबंध एक आध्यात्मिक यात्रा बन सकता है। प्रेम में मौन का रहस्य हर प्रेम को शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी दो व्यक्ति बिना कुछ कहे भी एक-दूसरे के साथ बहुत गहराई से उपस्थित हो सकते हैं। मौन में व्यक्ति के पास छिपने के लिए शब्द नहीं होते। वहाँ केवल उपस्थिति बचती है। स्त्रैण चेतना उस उपस्थिति को महसूस करती है। पुरुष चेतना उस मौन में जागती रहती है।

इसीलिए कभी-कभी जब गुरु के साथ हमारा बैठना होता है तो कुछ साबित नहीं करना पड़ता, शब्दों से कहीं अधिक गहरा अनुभव हो सकता है। प्रेम का अंतिम रहस्य शुरुआत में हम प्रेम में दूसरे को खोजते हैं। फिर धीरे-धीरे संबंध हमें स्वयं तक ले आता है। हम सोचते हैं कि दूसरा व्यक्ति हमें खुशी देगा। फिर एक दिन समझ में आता है कि दूसरा व्यक्ति हमारी खुशी का कारण बनने के साथ-साथ हमारी अधूरी जगहों को भी सामने ला रहा है। हम सोचते हैं कि प्रेम हमें केवल सुख देगा। लेकिन गहरा प्रेम हमारे भय, असुरक्षा और अहंकार को भी सामने लाता है। यही प्रेम का रहस्य है। प्रेम केवल आपको अच्छा महसूस कराने के लिए नहीं आता। कभी-कभी प्रेम आपको स्वयं से मिलाने के लिए आता है। और जब मनुष्य अपने भीतर स्त्रैण और पुरुष दोनों आयामों को पहचानने लगता है, तब वह प्रेम में अधूरापन भरने के लिए दूसरे को पकड़ना कम कर देता है। तब प्रेम एक आवश्यकता से धीरे-धीरे साझेदारी में बदल सकता है। स्त्रैण और पुरुष ऊर्जा का असंतुलन भय, नियंत्रण, अपेक्षा, अधिकार और संबंधों में संघर्ष क्यों पैदा होते हैं? जब मनुष्य के भीतर स्त्रैण और पुरुष दोनों आयाम संतुलन में होते हैं, तब उसके संबंधों में प्रेम के साथ जागरूकता, निकटता के साथ स्वतंत्रता और संवेदनशीलता के साथ स्थिरता दिखाई देती है। लेकिन जब इन दोनों पक्षों में असंतुलन पैदा होता है, तब प्रेम के भीतर धीरे-धीरे भय प्रवेश करने लगता है। और जहाँ भय होता है, वहाँ नियंत्रण जन्म लेता है। जहाँ नियंत्रण होता है, वहाँ स्वतंत्रता कम होने लगती है। जहाँ स्वतंत्रता कम होती है, वहाँ संबंध धीरे-धीरे प्रेम से अधिक संघर्ष बन सकता है। इसलिए संबंधों में होने वाले अधिकांश संघर्षों को केवल दूसरे व्यक्ति की गलती के रूप में देखने के बजाय, अपने भीतर के असंतुलन को समझना भी आवश्यक है। आभार

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