ये सांसें……
विचारों से बाहर
अनूठी रिदम में बहतीं,
हवायें भी……
ज़रा थम कर गुजरतीं,
धमनियों में
लहू हौले हौले दौङता,
हर धङकन दिल की…
अपनी धुन में कुछ कहती,
धरती किसी..
भाग दौड़ में नहीं
वो अपनी धुरी पर
धीरे-धीरे घूमती रहती,
जिस्म की जमीन पर
ये प्रेम भी……….
जीने में ही उमगता,
प्रेम में ही यहां सबकुछ हो रहा,
शायद..हम देखते नहीं
किसी जल्दी में कहीं
सिकुङे ही रहते
जिये बगैर.यूं ही दौङते फिरते,
ये खुला आसमान देखो
धीरे-धीरे ही सही…….
भीतर ही खिल रहा,
वो जीने के लिए
अद्भुत रोशनी सा
ख़ूबसूरत आंखों से बह रहा,
अनंत की रोशनी में….
जिसे भी देखो.वो जिंदा हो रहा,
होश की सरपरस्ती में
ये आसमां विस्तार ले रहा
जीवन की लहलहाती.
अनूठी मौजूदगी में……
हर कोई अपनी उङान भर रहा..!!
……..एक अहोभाव प्रभु🙏🏾