यह प्रश्न अद्वैत के प्रश्नों में से एक है—**“अगर मैं ही भ्रम हूँ, तो वास्तविकता का अनुभव कौन कर रहा है?”**
(Reality वाले पॉडकास्ट में गुरु जी ने बहुत अच्छे से समझाया था, ये सारी चीजें।)
इसे **Perceptive Reality ** और **Absolute Reality ** के बीच रखकर समझें।
Perceptive Reality — जो मुझे वास्तविक दिखाई देती है। जब हम कहते हैं **“मैं देख रहा हूँ”**, तो यहाँ तीन चीजें दिखाई देती हैं—
**देखने वाला – देखने की प्रक्रिया – दिखाई देने वाली वस्तु।**
हमें लगता है कि हम एक अलग व्यक्ति हैं, हमारे सामने एक अलग संसार है और हम उस संसार को अनुभव कर रहे हैं।
यही **Perceptive Reality** है—वह वास्तविकता जो **हमारी चेतना, इंद्रियों, स्मृतियों, संस्कारों और मन की व्याख्या के माध्यम से दिखाई देती है।**
जैसे स्वप्न में आप दौड़ रहे होते हैं। स्वप्न में दौड़ना वास्तविक लगता है, डर वास्तविक लगता है, शरीर भी वास्तविक लगता है।
लेकिन जागने पर पता चलता है कि **दृश्य भी उसी चेतना में था और देखने वाला भी।**
फिर भ्रम कौन है? यहाँ एक बहुत सूक्ष्म अंतर है।
अद्वैत यह नहीं कहता कि **“तुम्हारा अनुभव झूठा है।”** Perceptive Reality झूठ नहीं है। वह Absolute Reality नहीं है, लेकिन वह अपने स्तर पर वास्तविक है। उसकी अपनी functional utility है। वह जीवन को जीने, समझने, संबंध बनाने, सीखने और अंततः अपनी गहरी वास्तविकता की ओर जाने का माध्यम है।
जैसे मानचित्र स्वयं भूगोल नहीं है, लेकिन बिना मानचित्र के किसी अपरिचित स्थान तक पहुँचना कठिन हो सकता है।
उसी तरह हमारी perceptive reality अंतिम सत्य नहीं है, लेकिन वह सत्य तक पहुँचने का रास्ता खोल सकती है।
Perceptive Reality वह है जिसमें मैं संसार को अपने अनुभव के माध्यम से देखता हूँ। मुझे यह शरीर दिखाई देता है। लोग दिखाई देते हैं। प्रकृति दिखाई देती है। सुख-दुःख दिखाई देते हैं। समय, दूरी, संबंध और घटनाएँ दिखाई देती हैं।
यह सब मेरे अनुभव में वास्तविक है।
अगर मुझे चोट लगती है तो दर्द का अनुभव वास्तविक है।
अगर कोई मुझे प्रेम करता है तो उस प्रेम की अनुभूति वास्तविक है।
अगर मैं किसी फूल की सुगंध अनुभव करता हूँ तो वह अनुभव वास्तविक है।
इसलिए इसे केवल “भ्रम” कह देना अनुभव की पूरी प्रकृति को समझना नहीं है।
फिर भ्रम कहाँ है?
भ्रम शायद अनुभव में नहीं, बल्कि अनुभव की हमारी व्याख्या में है।
अर्थात— **दृश्य झूठा नहीं है,
दृश्य को देखने वाला अलग व्यक्ति है—यह धारणा भ्रम है **
लहर समुद्र से अलग दिखाई देती है, इसलिए उसका अपना अस्तित्व प्रतीत होता है। लेकिन लहर वास्तव में समुद्र से अलग कोई दूसरी वस्तु नहीं है।
वैसे ही— **व्यक्ति दिखाई देता है, व्यक्तित्व अनुभव होता है, लेकिन उसका अस्तित्व, अस्तित्व से अलग नहीं है।**
— Absolute Reality — जहाँ अनुभव करने वाला भी खोज में विलीन हो जाता है
अब प्रश्न और गहरा होता है—
**“अगर ‘मैं’ भी भ्रम है, तो अनुभव कौन कर रहा है?”**
यहीं **Absolute Reality** की ओर संकेत मिलता है।
परम स्तर पर शायद उत्तर यह नहीं है कि **“कोई दूसरा अनुभव करने वाला है।”**
बल्कि— **अनुभव हो रहा है, लेकिन अनुभव करने वाला कोई अलग केंद्र नहीं मिल रहा।**
देखना हो रहा है, सुनना हो रहा है, विचार उठ रहे हैं, भावनाएँ आ रही हैं, शरीर अनुभव कर रहा है।
लेकिन जब उस “मैं” को खोजते हैं तो एक स्वतंत्र, स्थायी “मैं” नहीं मिलता।
यही अद्वैत का रहस्य है।
—इसे एक सरल उदाहरण से अगर देखें तो आप आईने में अपना चेहरा देखते हैं।
**चेहरा — अनुभव का विषय है।**
**आँख और मन — अनुभव की प्रक्रिया हैं।**
**“मैं अपना चेहरा देख रहा हूँ” — perceptive reality है।**
लेकिन यदि हम पूछें—**“इस पूरे अनुभव को संभव बनाने वाली चेतना कहाँ से आई?”**
तो आप धीरे-धीरे उस जगह पहुँचते हैं जहाँ **subject और object का अंतर स्वयं प्रश्न बन जाता है।**
Absolute Reality में यह नहीं बचता—
**“मैं वास्तविकता को देख रहा हूँ।”**
बल्कि रह जाता है—
**“वास्तविकता स्वयं को प्रकट कर रही है।”**
—इसलिए “मैं भ्रम हूँ” कहना भी अधूरा है
यहाँ एक और गहराई है।
अगर कोई कहे—
**“मैं भ्रम हूँ।”**
तो तुरंत प्रश्न उठता है—
**“यह जान कौन रहा है कि मैं भ्रम हूँ?”**
लेकिन यदि हम उस जानने वाले को भी एक अलग सत्ता मान लें, तो फिर अद्वैत पूरा नहीं हुआ।
इसलिए अंतिम बात शायद यह है—
**भ्रम भी उसी में दिखाई देता है,
भ्रम का बोध भी उसी में होता है,
और वास्तविकता का अनुभव भी उसी में होता है।**
अलग से कोई दूसरा अनुभवकर्ता खोजने की आवश्यकता नहीं।
इसे प्रेम की भाषा में कहें तो—**प्रेम में जब तक “मैं प्रेम कर रहा हूँ” है, तब तक दो हैं। जब केवल प्रेम रह जाता है, तब प्रश्न भी बदल जाता है—प्रेम किसे हो रहा है? वहाँ प्रेम करने वाला और प्रेम पाने वाला दोनों उसी एक स्पंदन के रूप दिखाई देते हैं।**
यही **Perceptive Reality से Absolute Reality की यात्रा** है—
**“मैं वास्तविकता को अनुभव कर रहा हूँ” से “वास्तविकता स्वयं को अनुभव कर रही है” तक।**
आभार 🙏🏻🙏🏻🙏🏻