ध्यान और प्रेम को विभाजित करके मत देखो, वह एक ही है। तुम किसी एक की बात कर रहे होते हो तो उसमें दूसरा शामिल होता ही है, लगातार दोनों की बात करने की आवश्यकता भी नहीं है, तुम किसी एक का ही प्रयोग कर सकते हो। जहाँ कहीं भी संवेदनशीलता है, सजगता है, चेतना का उत्सव है वहीं ध्यान है और वहीं प्रेम है, प्रेम कोई अलग चीज नहीं है।
प्रेम का भावुकता से कोई लेना देना नहीं है, भावुकता प्रायः तुम्हारी चेतना को धुंधला कर देती है। प्रेम भावुकता की सीमाओं से ऊपर उठ जाता है और संवेदनशीलता के आयाम में प्रवेश कर जाता है। यह आयाम ही ध्यान का आयाम है।
जब अध्यात्म में हम ह्रदय की बात करते हैं तो यह तुम्हारे शरीर में रक्त पंप करने वाली मशीन की बात नहीं होती। ह्रदय किसी सीमित केंद्र या व्यवस्था का नाम नहीं है, वह तो एक सर्वव्यापी तत्व है, यह तत्व सब कुछ को अपने में शामिल कर लेता है। ह्रदय केंद्र जिसे तुम कहते हो वह तुम्हारे अस्तित्व का केंद्र है, जिससे निकल कर सारा जीवन गतिमान होता है, इस केंद्र की ऊर्जा से ही सब गतिमान है। प्रेम को तुम निर्मित नहीं करते, वरन उसी ने तुम्हें निर्मित किया है।
प्रेम की तलाश मत करो, तुम उसी में स्थित हो। तलाश तुम्हें प्रायः भटका देती है, तुम बस अपने जीवन के रहस्य के प्रति जागो, अपनी धारणाओं के पिंजरे तोड़ो और अतिशय संवेदनशीलता से भर जाओ, तब प्रेम तुम्हें हर ओर से घेर लेता है। जीवन की अजस्र धाराओं के रूप में यह तुम्हारे भीतर और बाहर तरंगित होने लगता है। जब ऐसा होता है तब तुम यह नहीं कह सकते कि, क्या प्रेम है और क्या प्रेम नहीं है।
जब ऐसी अवस्था घटित होती है, उसे ही ध्यान कहते हैं। ध्यान और प्रेम पर्यायवाची है।
Gratitude Prabhu🙏🙏🙏 🌹🌹🌹
Pranam Gurudev🙏🙏🌹
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Very deep insight for we all seekers.
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