मंदिरों में परिक्रमा करने की प्रक्रिया है. ये जीवन के एक चक्र में घूमने की ओर इशारा है. पूरा जीवन एक वर्तुल में, एक चक्र में घूम रहा है. और चक्रों में घूमता ये जीवन, छोटे – बड़े वर्तुलों के अंतर्संबंध से आपस में गुंथा हुआ है. ये आधुनिक भौतिक विज्ञान के इस सत्य का प्रतीकात्मक स्वरूप है जिसमें परमाणु की संरचना में एक केंद्र है और उसके चारों ओर अलग अलग कक्षाओं में ऊर्जाकण गति कर रहे हैं.
हमारा पूरा जीवन ऐसा ही है. एक ऊर्जाकण को जब अपने से ऊपर की कक्षा में जाना होता है तो उसे एक निश्चित ऊर्जा को उपलब्ध होना पड़ता है, और उससे कम ऊर्जा होने पर वो निचली कक्षा में गिर सकता है.
ऐसा ही जीवन में भी है – ऊपर जाना है तो अपनी ऊर्जा को और अपनी तरंगों को ऊपर उठने दो, अपने आहार, विचार और भाव से ऊपर की गति करो.
परिक्रमा में एक केंद्र है और एक परिधि. मंदिर में परमात्मा केंद्र में है और मनुष्य परिधि पर. मनुष्य, जीवन के मंदिर में, भीतर की ओर जाये तो परमात्मा हो जायेगा और बाहर बाहर ही जीवन की परिधि पे घूमता रहे तो बस सामान्य सुख-दुःख से घिरा सामान्य मनुष्य ही रह जायेगा.
एक और बात है परिक्रमा के प्रतीक में कि यदि परिधि को बदलना है तो केंद्र को बदल दो. केंद्र में यदि भगवत्ता हो तो परिधि भी उसकी सुगंध से भर जाएगी. मंदिर की परिक्रमा में यही इशारा छुपा है.
तुम्हें अपनी परिधि पर घट रही स्थितियों और घटनाओं से परेशानी है तो देखो कि तुम्हारे जीवन के केंद्र में क्या है? परिधि पर दुःख है तो अपने केंद्र के विषय की खोज करो. प्रत्येक व्यक्ति ने अपना वैकल्पिक केंद्र निर्मित कर लिया है, वही सारे दुःख का कारण है. वास्तविक केंद्र तो आनंद, शांति, शुभता से भरी भगवत्ता ही है. वैकल्पिक केंद्र से वास्तविक केंद्र की उपलब्धि ही है परिक्रमा का अभिप्राय.
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🙏हम अपने वास्तविक केंद्र की ओर ही गति करे।🙏
परिक्रमा का सुंदर अभिप्राय 🙏🙏🌹
Gratitude for such s valuable guidance Master