जीवन को बहुआयामी होना है. जीवन में धन भी हो और जीवन में ध्यान भी हो. बिना ध्यान के जो धन है वो तुम्हें अपंग बना देता है. और जो ध्यान बिना धन के है वह भी तुम्हें सीमित कर देता है. जीवन में दोनों ध्रुव आवश्यक हैं.
एक ध्रुव से ही न चलें. अध्यात्म का धन से कोई विरोध नहीं है. अध्यात्म निश्चित रूप से आंतरिक धन की बात करता है लेकिन आंतरिक धन की बात करना तुम्हारे बाहरी धन का विरोध नहीं है. प्रारंभिक तल पर यह तुम्हारे चुनाव की बात है.
प्रारम्भिक तल पर अगर तुम आंतरिक जीवन को चुनोगे तो तुम्हारे लिए अच्छा होगा. सारे सम्बुद्ध मित्र आंतरिक धन की बात इसीलिये करते हैं कि जब तुम्हारे पास चुनने का मौका हो तो तुम पहले आंतरिक जीवन को चुनो, क्योंकि आंतरिक जीवन ही बाहरी जीवन बनेगा. लेकिन बाहरी जीवन की उपेक्षा न करो.
केंद्र की फ़िक्र पहले करनी है लेकिन परिधि की उपेक्षा नहीं करनी है. केंद्र और परिधि दोनों को एक साथ सुन्दर बनाना है. जिसके जीवन में ध्यान प्रवेश करता है, सही अर्थों में उसके पास जीवन में धन भी प्रवेश करता है, बाहरी धन भी. मैं केवल भीतरी धन की बात नहीं कर रहा हूँ. बाहरी धन भी तुम्हारी भीतरी समृद्धि का ही प्रतीक है.
कई बार तुम बाहर धन का अम्बार लगा कर भी बिलकुल निर्धन अनुभव कर सकते हो, तब तुम समझ सकते हो कि ऐसा तुम इसलिए ही अनुभव कर रहे हो क्योंकि तुमने अपने भीतर के धन का अनुभव नहीं किया है. जब तुम भीतर ध्यान के अनुभव से गुजर रहे होगे तो बाहर का धन जीवंत हो उठेगा. तब तुम उसका जीवन के विकास में सदुपयोग कर पाओगे…
Gratitude!!!
नमन सद्गुरु…. एक अहोभाव 🏵️🌷🌼🌻🌸🌹🌺🥀🥀❤️❤️❤️❤️🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
🙏🪷💛🧡 gratitude
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Pronam gurudev
प्रणाम तथागत सदगुरु जी🌹🙏🌹🙏
Very nice