अस्तित्व का एक ही स्पंदन:-
अस्तित्व से हम अलग कहाँ हैं? हम अक्सर स्वयं को अस्तित्व से अलग मानकर जीते हैं—जैसे *मैं* यहाँ हूँ और अस्तित्व कहीं बाहर है। लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो प्रश्न उठता है—
**अलग कहाँ हैं हम? **
जिस मूल तवत से यह पूरा जगत बना है, उसी से हमारा शरीर बना है। विज्ञान हमें बताता है कि हमारे शरीर के प्रमुख तत्व—कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन आदि—वही हैं जो प्रकृति में सर्वत्र पाए जाते हैं।
जो मिट्टी में है, वही हमारे भीतर है।
जो वृक्ष में है, वही किसी न किसी रूप में हमारे भीतर है।
जो ब्रह्मांड में है, उसी का पदार्थ हमारे शरीर में भी है।
अर्थात् हम अस्तित्व के बाहर से आए हुए कोई अलग तत्व नहीं हैं। **हम अस्तित्व की ही एक अभिव्यक्ति हैं।** लेकिन रहस्य केवल शरीर तक सीमित नहीं है।
स्थूल के पीछे सूक्ष्म है। जो दिखाई देता है, उसके पीछे बहुत कुछ ऐसा है जो दिखाई नहीं देता। ऊर्जा, स्पंदन, भावना, विचार और संभावना—ये सब उस सूक्ष्म आयाम की ओर संकेत करते हैं जो स्थूल अभिव्यक्ति से पहले होता है। लेकिन सूक्ष्म और स्थूल को दो अलग संसार मानना भी शायद अधूरा है।
**सूक्ष्म ही स्थूल का एक रूप है और स्थूल ही सूक्ष्म की एक अभिव्यक्ति।** सूक्ष्म स्थूल को शक्ति देता है और स्थूल भी वापस सूक्ष्म को प्रभावित करता है।
अर्थात् अस्तित्व की गति एक दिशा में नहीं है। यह एक निरंतर आदान-प्रदान है।
सूक्ष्म से स्थूल, स्थूल से सूक्ष्म, संभावना से अभिव्यक्ति, अभिव्यक्ति से नई संभावना। **दोनों मिलकर अस्तित्व को गतिमान रखते हैं।**
Premon — मूल स्पंदन, यदि हम इस पूरी प्रक्रिया को और गहराई से देखें तो प्रश्न उठता है— आखिर इस गति के मूल में क्या है?
वह पहली हलचल क्या है जिससे आगे भावना, विचार, ऊर्जा और अंततः रूप प्रकट होते हैं?
गुरु जी जिस मूल स्पंदन को **“Premon”** कहते हैं, उसे इस रहस्य की ओर संकेत की तरह समझा जा सकता है। कई लोग इसे ॐ कहते हैं।
अगर हम प्रेम को — मूल स्पंदन में देखें तो चीजें और स्पष्ट हो सकती है।
1. प्रेम — आरंभ- (Premon)
अभी कुछ बना नहीं है।
कोई नाम नहीं, कोई रूप नहीं, कोई संबंध नहीं।
बस एक **स्पंदन** है।
यही मूल आकांक्षा है—**स्वयं को प्रकट करने की।**
जैसे बीज के भीतर वृक्ष बनने की कोई आवाज़ नहीं होती, लेकिन एक अदृश्य संभावना होती है, वैसे ही अस्तित्व के मौन में प्रेम पहला स्पंदन है। अस्तित्व का स्वयं को प्रकट करना है।
2. प्रेम — विस्तार
जब मूल स्पंदन गति लेता है, तो विविधता दिखाई देने लगती है, एक से अनेक, सूक्ष्म से स्थूल, भावना से विचार, विचार से कर्म, कर्म से सृष्टि।
यहीं प्रेम संबंधों, प्रकृति, जीवन और चेतना के असंख्य रूपों में फैलता है। इस दृष्टि से **सृष्टि प्रेम का विस्तार** है।
3. प्रेम — विलय
विस्तार की यात्रा अंततः वापस उसी मूल की ओर जाती है।
जो अलग-अलग दिखाई दे रहा था, वह अपने मूल में एक ही था। इसलिए विलय का अर्थ किसी चीज़ का नष्ट होना नहीं, बल्कि **अलगाव की पहचान का मिटना** है।
प्रेम जहाँ पूर्ण होता है अर्थात गहरा होता है पूर्ण तो है ही वो गहराई के तरफ जाता है।
4. प्रेम — मौन
और फिर वही मौन। लेकिन अब यह आरंभ का मौन नहीं है।
पहले मौन में प्रेम **संभावना** था।
अब मौन में प्रेम **पूर्णता** है। मतलब गहराई है।
इसलिए यात्रा वास्तव में वृत्ताकार है:
**मौन में प्रेम छिपा था → प्रेम स्पंदित हुआ → सृष्टि बनी → प्रेम ने स्वयं को विस्तार दिया → सब अपने मूल में लौटा → फिर वही मौन।**
**प्रेम कोई भावना नहीं है, प्रेम वह मूल स्पंदन है, जिससे भावना जन्म लेती है, प्रेम कोई संबंध नहीं है, प्रेम वह मूल गति है, जिससे संबंध बनते हैं, प्रेम कोई एक अनुभव नहीं है, प्रेम वह स्पंदन है, जिससे अस्तित्व स्वयं को अनुभव करता है, **और जब यह स्पंदन अपनी यात्रा पूरी करता है, तो वह फिर मौन में लौटता है, जहाँ प्रेम समझ आता है प्रेम ही अस्तित्व है।
इस तरह **ॐ को मूल स्पंदन का ध्वनि-प्रतीक** और **प्रेम को उस मूल स्पंदन का अस्तित्वगत अर्थ** माना जा सकता है।
चार अवस्थाओं को अगर प्रेम की दृष्टि से देखें तो-
1. जाग्रत — प्रेम का अनुभव
जाग्रत अवस्था में हम संसार को अलग-अलग रूपों में देखते हैं—मैं, तुम, प्रकृति, संबंध। इसलिए यहाँ प्रेम भी अक्सर किसी व्यक्ति, वस्तु या अनुभव से जुड़ता है। मैं किसी को प्रेम करता हूँ, मुझे किसी की उपस्थिति अच्छी लगती है, मैं किसी के लिए करुणा अनुभव करता हूँ। यह प्रेम का सबसे स्थूल और दिखाई देने वाला रूप है। जाग्रत में प्रेम संबंध बनकर दिखाई देता है।
2. स्वप्न — प्रेम का आंतरिक विस्तार
स्वप्न में बाहरी संसार पीछे हट जाता है और मन स्वयं भीतर के संसार से जुड़ता है। यहाँ प्रेम बाहरी व्यक्ति से हटकर स्मृति, कल्पना, इच्छा और भावनाओं के भीतर चलता है। कभी कोई व्यक्ति सामने नहीं होता, फिर भी उसकी उपस्थिति भीतर जीवित रहती है। इसलिए स्वप्न को प्रेम के उस आयाम की तरह देख सकते हैं जहाँ— प्रेम बाहर किसी को खोजने के बजाय भीतर अपना संसार रचता है।
जाग्रत में प्रेम **दृश्य** है,
स्वप्न में प्रेम **अनुभूति** है।
3. सुषुप्ति — प्रेम का निराकार विश्राम
गहरी नींद में न व्यक्ति की स्पष्ट पहचान रहती है, न संबंधों की कहानी, न विचारों का संसार, फिर भी जागने पर हम कहते हैं—“मैं बहुत सुख से सोया।” यहाँ प्रेम को किसी व्यक्ति या वस्तु से जोड़ना संभव नहीं। वह रूप, संबंध और विचार से पहले की शांति जैसा है। इसलिए प्रेम का यह आयाम ऐसा है जहाँ प्रेम किसी को पाने या देने की क्रिया नहीं रह जाता। सुषुप्ति में प्रेम संबंध से मुक्त होकर विश्राम बन जाता है।
4. तुरीय — प्रेम का अद्वैत
यह जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के बाहर कोई चौथी जगह नहीं, बल्कि वह चेतना है जो इन तीनों अवस्थाओं की **साक्षी** मानी जाती है। प्रेम की भाषा में कहें तो यहाँ सबसे बड़ा परिवर्तन होता है।
अब **मैं प्रेम करता हूँ**
से**प्रेम है** तक यात्रा होती है।
**प्रेम स्वयं होने का स्वरूप बन जाता है।** तुरीय में प्रेम किसी के बीच नहीं रहता— प्रेम ही वह एकत्व बन जाता है जिसमें “दो” दिखाई देना समाप्त हो जाता है।
इसलिए चारों को एक सूत्र में देखें
**जाग्रत — प्रेम संबंध है।**
**स्वप्न — प्रेम अनुभूति है।**
**सुषुप्ति — प्रेम विश्राम है।**
**तुरीय — प्रेम अद्वैत है।**
**मूल मौन में प्रेम स्पंदित होता है, जाग्रत में वह संबंध बनता है, स्वप्न में वह भीतर के संसार से जुड़ता है, सुषुप्ति में वह सब रूपों से विश्राम करता है, और तुरीय में वह पहचान लेता है, जिसे मैं प्रेम कर रहा था, वह मुझसे अलग कभी था ही नहीं।**
**यही प्रेम का अद्वैत है।**एक ऐसा मूल स्पंदन जो स्वयं किसी स्थूल वस्तु के रूप में दिखाई नहीं देता, लेकिन जिससे अभिव्यक्ति की अनगिनत संभावनाएँ जन्म लेती हैं। और यदि इस मूल स्पंदन को प्रेम की दृष्टि से देखें, तो प्रेम केवल मनुष्य के मन में उठने वाली भावना नहीं रह जाता। **प्रेम अस्तित्व की जोड़ने वाली शक्ति बन जाता है।**
वह अदृश्य सूत्र, जो अलग-अलग दिखाई देने वाली चीजों के भीतर भी कोई गहरा संबंध बनाए रखता है। इसलिए प्रेम शायद केवल “किसी से प्रेम करना” नहीं है। प्रेम वह अवस्था है जहाँ हमें यह अनुभव होने लगता है कि जिसे हम “दूसरा” कह रहे हैं, वह भी उसी अस्तित्व की अभिव्यक्ति है जिसकी एक अभिव्यक्ति हम स्वयं हैं। जहाँ शब्द समाप्त होते हैं, वहाँ भी संबंध बना रहता है। **वहीं प्रेम का स्पंदन है।**
चेतना हर जगह है—लेकिन क्या हम जीवंत हैं? कई बार लोग प्रश्न करते हैं चेतना कहाँ कहाँ है? कहाँ नहीं है?
यदि चेतना केवल मनुष्य के भीतर होती, तो फिर इस पूरे अस्तित्व में जीवन की यह निरंतर गति कहाँ से आती?
पृथ्वी में परिवर्तन हो रहा है।
जल निरंतर गतिमान है।
वायु बह रही है।
अग्नि रूप बदल रही है।
वृक्ष बढ़ रहे हैं।
फूल खिल रहे हैं।
तारे जन्म ले रहे हैं और समाप्त हो रहे हैं।
हर जगह कोई न कोई प्रक्रिया चल रही है।
आध्यात्मिक दृष्टि से कहा जा सकता है—
**चेतना हर जगह है।** लेकिन उसे महसूस करने के लिए केवल आँखें पर्याप्त नहीं हैं। हमें **जीवंत** होना होगा। प्रेमपूर्ण होना होगा,
क्योंकि समस्या शायद चेतना के अनुपस्थित होने की नहीं है।
समस्या यह है कि हम स्वयं इतने संवेदनशील नहीं रह जाते कि उसके स्पंदन को अनुभव कर सकें।
एक फूल के पास बैठकर कोई केवल फूल देख सकता है। लेकिन कभी-कभी कोई दूसरा व्यक्ति उसी फूल के सामने बैठकर अचानक कुछ और महसूस करता है— जैसे फूल केवल दिखाई नहीं दे रहा, बल्कि किसी मौन संवाद में सहभागी है। फूल वही है। स्थान वही है। लेकिन अनुभव बदल गया, क्योंकि देखने वाला बदल गया।
**जब भीतर जीवंतता आती है, तो अस्तित्व की सूक्ष्मता दिखाई देने लगती है।**
गुरु जी किसी स्थान पर जाते हैं। वही स्थान जहाँ हम पहले भी जा चुके हों। वही वृक्ष। वही मिट्टी। वही आकाश। वही रास्ते।
लेकिन उनके साथ वहाँ जाने पर अचानक वही स्थान हमें अधिक जीवंत लगने लगता है।
क्यों? शायद इसलिए कि **जीवंत चेतना केवल स्वयं में ही नहीं धड़कती—उसकी उपस्थिति आसपास के सूक्ष्म वातावरण में भी हलचल पैदा कर सकती है।**
एक अत्यंत जीवंत व्यक्ति किसी ऐसी जगह पर जाता है जो हमारी दृष्टि से बिल्कुल सामान्य या जड़ प्रतीत होती है। लेकिन उनकी उपस्थिति वहाँ के सूक्ष्म जगत के साथ एक अलग प्रकार का संवाद स्थापित कर सकती है। जैसे शांत जल में एक छोटी-सी तरंग उठती है और दूर तक फैल जाती है।
**जीवंत चेतना की उपस्थिति भी ऐसी ही तरंग होती है।**
इसीलिए संभव है कि जिस स्थान पर कोई बुद्ध लंबे समय तक रहे हों, ध्यान करते हों, मौन में बैठे हों, प्रेम में रहे हों—वह स्थान बाद में भी लोगों को कुछ अलग अनुभव कराए।
हम कहते हैं—
“इस जगह में कुछ है।”
हम उसे पकड़ नहीं सकते। माप नहीं सकते। शायद ठीक-ठीक शब्दों में समझा भी नहीं सकते। लेकिन महसूस कर सकते हैं।
स्थान भी स्मृति सँभालते हैं, इसे एक सरल उदाहरण से समझें।
यदि कोई सुगंधित फूल लंबे समय तक किसी कमरे में रखा जाए, तो फूल के चले जाने के बाद भी उसकी सुगंध कुछ समय उस कमरे में बनी रह सकती है।
**फूल चला गया, लेकिन उसकी उपस्थिति की छाप रह गई।**
आध्यात्मिक परंपराएँ इसी प्रकार यह संभावना व्यक्त करती हैं कि अत्यंत गहरी चेतना की उपस्थिति भी किसी स्थान में सूक्ष्म छाप छोड़ सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि पत्थर या मिट्टी किसी व्यक्ति की तरह चेतन हो गए। बल्कि यह कि **स्थान और चेतना के बीच घटा कोई गहरा अनुभव उस वातावरण की अनुभूति को प्रभावित कर सकता है।** इसीलिए जिन स्थानों पर बुद्ध या महान साधक रहे, उन्हें केवल ऐतिहासिक स्थल मानने के बजाय साधना-परंपराएँ अक्सर उनकी **उपस्थिति की स्मृति** से भी जोड़ती हैं।
स्थान जैसे उस उपस्थिति को अपने भीतर सँभाल लेते हैं।
आकाशिक रिकॉर्ड — अस्तित्व की सूक्ष्म स्मृति, इसी विचार के आसपास आध्यात्मिक परंपराओं में **आकाशिक रिकॉर्ड** की अवधारणा आती है।
इसे इस रूप में समझना चाहिए—एक ऐसी धारणा कि अस्तित्व में घटनाओं, अनुभवों और चेतना की सूक्ष्म छापें किसी स्तर पर बनी रह सकती हैं।
यदि इसे प्रतीक के रूप में देखें, तो यह विचार बहुत गहरा है। हम स्थूल घटना को समाप्त होते देखते हैं।
लेकिन क्या उसका प्रभाव भी उसी क्षण समाप्त हो जाता है? एक शब्द किसी व्यक्ति के जीवन को बदल सकता है।
एक प्रेम किसी व्यक्ति की पूरी दिशा बदल सकता है।
एक बुद्ध की उपस्थिति हजारों लोगों के भीतर परिवर्तन का कारण बन सकती है। व्यक्ति चला जाता है। लेकिन उसके कारण जो परिवर्तन हुए, वे दूसरे लोगों, संबंधों और स्थानों में आगे भी चलते रहते हैं। इस अर्थ में अस्तित्व में कुछ भी बिल्कुल अकेले नहीं घटता।
**हर स्पंदन दूसरे स्पंदनों को छूता है।**
—जन्म और मृत्यु भी इसी नृत्य का हिस्सा हैं तब जन्म और मृत्यु को भी एक नई दृष्टि से देखा जा सकता है।
जन्म—सूक्ष्म संभावनाओं का स्थूल अभिव्यक्ति में आना।
मृत्यु— स्थूल अभिव्यक्ति का अपने वर्तमान रूप से आगे बदल जाना।
फूल खिलता है। फिर मुरझाता है। लेकिन जीवन की प्रक्रिया समाप्त नहीं होती।
रूप बदलता है। संबंध बदलते हैं। प्रभाव आगे बढ़ते हैं।
जैसे फूल की आकृति समाप्त होने पर भी उसकी सुगंध किसी दूसरे अनुभव का कारण बन सकती है।
इसलिए जन्म और मृत्यु शायद अस्तित्व के दो विरोधी छोर नहीं हैं।
वे **सूक्ष्म और स्थूल के बीच होने वाली निरंतर गति की अवस्थाएँ** हैं।
अस्तित्व किसी एक रूप में स्थिर नहीं है।
वह निरंतर घट रहा है। निरंतर बदल रहा है। निरंतर स्पंदित हो रहा है। —और यहाँ सबसे महत्वपूर्ण शब्द है—जीवंतता
शायद आध्यात्मिक यात्रा का अर्थ चेतना को कहीं बाहर से प्राप्त करना नहीं है।
चेतना पहले से है। अस्तित्व पहले से है। स्पंदन पहले से है। प्रेम पहले से है।
हमें केवल इतना करना है कि हम स्वयं **जीवंत** हो जाएँ।
इतने जीवंत कि हवा केवल हवा न रह जाए। फूल केवल फूल न रह जाए। किसी व्यक्ति की उपस्थिति केवल उसकी देह की उपस्थिति न रह जाए।
किसी स्थान की मिट्टी केवल मिट्टी न रह जाए। मौन केवल शून्यता न रह जाए।
बल्कि हर जगह हमें कोई सूक्ष्म संवाद महसूस होने लगे। और शायद यही वह क्षण है जब मनुष्य पहली बार देखता है—
**अस्तित्व हमसे अलग नहीं है।**
सूक्ष्म हमारे भीतर है। स्थूल हमारे सामने है। और दोनों के बीच जीवन का एक ही स्पंदन चल रहा है। — उस स्पंदन का नाम प्रेम है अंततः बात फिर वहीं लौट आती है।
यदि सब कुछ एक ही अस्तित्व की अभिव्यक्तियाँ हैं, तो उन्हें जोड़ने वाला क्या है?
यदि सूक्ष्म और स्थूल निरंतर एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं, तो उस गति के भीतर क्या है?
यदि एक जीवंत चेतना किसी स्थान और दूसरे मनुष्य की चेतना को भी स्पर्श कर सकती है, तो उस स्पर्श का सबसे गहरा अर्थ क्या है?
शायद— **प्रेम।**
प्रेम केवल भावना नहीं।
प्रेम वह स्पंदन है जिसमें अलग-अलग दिखाई देने वाली चीजें भीतर से जुड़ी हुई हैं।
जहाँ शब्द नहीं हैं, वहाँ भी संबंध है। जहाँ संबंध है, वहाँ संवेदना है। जहाँ संवेदना है, वहाँ स्पंदन है। और जहाँ स्पंदन को महसूस करने की क्षमता जागती है—
**वहीं चेतना का अनुभव होने लगता है।**
इसलिए शायद हमें चेतना को खोजने की आवश्यकता नहीं है। हमें केवल अपने भीतर की जड़ता को हटाना है।
हमें जीवंत होना है। हमें महसूस करना है। हमें प्रेम में होना है। क्योंकि— चेतना हर जगह है।
अस्तित्व हर क्षण धड़क रहा है। सूक्ष्म और स्थूल एक ही नृत्य की दो अवस्थाएँ हैं।
और उस पूरे नृत्य का सबसे मूल स्पंदन— प्रेम है।
—यही स्पंदन एक रहस्य और खुलता है हमारे सामने, की जब भी हम उस स्पंदन को गहराई से महसूस करते हैं अस्तित्व में सूक्ष्म में कई ऐसे points हैं या कहें *portals* हैं जिसका दरवाजा अस्तित्व खोलता है। एक सरल भाषा में समझें तो जब भी हम किसी से बहुत प्रेम से रहते हैं judge नहीं करते तो वो व्यक्ति भी अपने रहस्यों का दरवाजा खोलता है। वह केवल अपनी कही हुई बातों तक सीमित नहीं रहता। उसके मौन, उसकी उपस्थिति, उसकी आँखों, उसके भावों और उसके भीतर छिपे हुए सूक्ष्म आयामों का अनुभव होने लगता है। मानो उसके भीतर कोई दरवाज़ा था, जो प्रेम की उपस्थिति में धीरे-धीरे खुल गया। ऐसे ही अस्तित्व में कई portals हैं जहाँ प्रेम के स्पंदन सबसे ज्यादा हों जहाँ प्रेमपूर्ण लोगों की एक लंबी श्रृंखला रही हो, और जब ये पोर्टल्स ओपन होते हैं तो अस्तित्व में सूक्ष्म कि हलचलों का भी पता चलता है और गहरे आयामों का भी। हम सामान्यतः अस्तित्व को उसकी स्थूल अभिव्यक्तियों में देखते हैं। व्यक्ति दिखाई देता है, वृक्ष दिखाई देता है, नदी दिखाई देती है, कोई स्थान दिखाई देता है। लेकिन इनके पीछे भी स्पंदनों की एक सूक्ष्म दुनिया निरंतर चल रही हो सकती है। प्रश्न केवल इतना है कि क्या हमारी संवेदनशीलता उस सूक्ष्म हलचल को ग्रहण करने के लिए खुली है?
यह पोर्टल वास्तव में कहाँ है? शायद दूसरे व्यक्ति में भी और हमारे भीतर भी। क्योंकि प्रेम केवल सामने वाले को नहीं खोलता—वह हमारी ग्रहण करने की क्षमता को भी खोलता है। इसी अर्थ में अस्तित्व में अनेक सूक्ष्म portals हो सकते हैं। कुछ व्यक्ति स्वयं ऐसे द्वार बन जाते हैं, कुछ स्थान, कुछ संबंध, कुछ क्षण और कभी-कभी कोई ऐसी उपस्थिति, जिसके पास जाकर हमें लगता है कि वातावरण में कुछ बदल गया है। वहाँ कुछ नया पैदा नहीं हुआ। वहाँ बुद्धों की एक निरंतरता रही है उनकी सुगंध मौजूद है, हमारी tuning जैसे बदलती है हम जुड़ जाते हैं।जैसे रेडियो की तरंगें पहले से मौजूद हों, लेकिन सही frequency पर आने के बाद ही संगीत सुनाई देने लगे, वैसे ही अस्तित्व की सूक्ष्म हलचलें भी हमारे लिए तभी अर्थपूर्ण होने लगती हैं जब हमारी चेतना उनमें tune होने लगे।
और इस tuning की पहली शर्त है— प्रेम।
दूसरी है संवेदनशीलता।
और तीसरी है—निर्णय से मुक्त होना। क्योंकि judgment चेतना को बंद कर देता है।
हम जैसे ही किसी व्यक्ति को तुरंत किसी श्रेणी में रख देते हैं—अच्छा, बुरा, सही, गलत, अपना, पराया—हमने उसके रहस्य के चारों ओर एक दीवार खड़ी कर दी। फिर हम व्यक्ति को नहीं देखते, केवल अपनी बनाई हुई उसकी छवि को देखते हैं। इसी तरह कई बार हम अपने अनुभवों को कहने, उसको इंटरप्रेट करने, किसी से सुनने में एक दीवार बना देते हैं।
Premon, अस्तित्व का मूल स्पंदन , तो प्रेम का विस्तार उस मूल स्पंदन के साथ हमारी resonance है। जितनी अधिक संवेदनशीलता, उतनी सूक्ष्म resonance। और जितनी सूक्ष्म resonance, उतना ही अधिक अस्तित्व के उन आयामों का अनुभव संभव होता है जो सामान्य इंद्रियबोध में दिखाई नहीं देते। इसीलिए संभव है कि कुछ स्थानों पर हमें असाधारण शांति, जीवंतता या किसी अनकहे रहस्य की अनुभूति हो। शायद उन स्थानों की स्मृतियों, वहाँ से जुड़े मनुष्यों और उनकी चेतना की उपस्थिति ने एक ऐसा मानवीय-सूक्ष्म क्षेत्र निर्मित किया हो जिसमें अनेक प्रेमपूर्ण उपस्थितियाँ एक-दूसरे को reinforce करती रही हों।
एक व्यक्ति प्रेम में जीता है।फिर दूसरा। फिर तीसरा।
फिर प्रेमपूर्ण चेतनाओं की एक पूरी श्रृंखला बन जाती है।
वह एक प्रकार का living field बन सकता है बुद्ध चेतनाओं की धारा का।
और जब भी किसी के लिए ऐसे portals खुलते हैं तो वहाँ ऐसा अनुभव होता है कि किसी ने उसे रास्ता नहीं दिखाया—फिर भी रास्ता दिखाई देने लगा।
किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया—फिर भी भीतर कोई प्रश्न शांत हो गया।
किसी ने कोई रहस्य नहीं बताया—फिर भी लगता है कि अस्तित्व ने अपना कोई पर्दा थोड़ा-सा हटा दिया।
और तब प्रेमपूर्ण मनुष्य स्वयं भी एक प्रकार का portal बन सकता है। प्रेम से भरा स्थान, दिव्य उपस्थिति का स्थान, नदियाँ कुछ भी portal बन सकता है।
Premon का स्पंदन शायद हर जगह है। लेकिन उसे सुनने के लिए चाहिए— प्रेम की संवेदनशीलता। और जब प्रेम इतना सूक्ष्म हो जाता है कि वह शब्दों से पहले स्पंदन को सुनने लगे, तब अस्तित्व और हमारे बीच की दूरी कम होने लगती है।
फिर हम अस्तित्व को केवल देखते नहीं— अस्तित्व हमें छूने लगता है। और शायद यही उस मूल Premon की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है—
जहाँ शब्द समाप्त होते हैं, वहाँ स्पंदन बोलता है।
जहाँ स्पंदन को सुनने की संवेदनशीलता आती है, वहाँ प्रेम जन्म लेता है।
और जहाँ प्रेम पूर्ण संवेदनशीलता बन जाता है, वहाँ अस्तित्व के रहस्य अपने-आप खुलने लगते हैं।
यही बात *ज्ञानगंज* *shangri -la, सिद्धाश्रम* , जैसी अवधारणाओं को एक अलग अर्थ में देखने का अवसर देती है। ज्ञानगंज को भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में एक ऐसे रहस्यमय क्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है जिसका कोई सामान्य, सर्वमान्य भौगोलिक नक्शा हमारे पास नहीं है।
अर्थात— कुछ स्थान नक्शे पर होते हैं,
कुछ स्थान चेतनाओं की धारा में।
और शायद कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो दोनों के बीच की सीमा को ही धुंधला कर देते हैं। इसीलिए संभव है कि अस्तित्व में ऐसे असंख्य portals हों—कुछ मनुष्यों के माध्यम से, कुछ स्थानों के माध्यम से, कुछ संबंधों के माध्यम से और कुछ ऐसी परंपराओं या चेतना-क्षेत्रों की अवधारणाओं के माध्यम से, जिन्हें सामान्य भौगोलिक भाषा में पूरी तरह पकड़ा नहीं जा सकता।
ज्ञानगंज जैसी अवधारणा को इसी रहस्य में रखा जा सकता है।
वह हमें यह प्रश्न देती है—
क्या हर वास्तविकता को नक्शे पर अंकित करना आवश्यक है?
क्या केवल वही स्थान वास्तविक हैं जिनके coordinates दिए जा सकते हैं?
हम सपने में जाते हैं—लेकिन सपने का कोई latitude-longitude नहीं होता।
प्रेम में प्रवेश करते हैं—लेकिन प्रेम का कोई भौगोलिक पता नहीं होता।
ध्यान में उतरते हैं—लेकिन ध्यान की कोई सड़क नहीं होती।
फिर भी इन अवस्थाओं का अनुभव मनुष्य के लिए वास्तविक हो सकता है।
इसी तरह ज्ञानगंज को एक चेतना-आधारित रहस्य की तरह पढ़ा जा सकता है—एक ऐसी अवधारणा, जहाँ भौगोलिक नक्शा समाप्त होता है और चेतना का नक्शा शुरू होता है। और शायद यही Premon का रहस्य है।
Premon स्वयं कोई कहीं धड़कता दिखाई नहीं देता,
वह, वह मूल स्पंदन है जिसके साथ tune होकर कुछ स्थान और कुछ चेतनाएँ हमारे लिए portals बन जाती हैं।तब किसी गुरु की उपस्थिति, किसी प्राचीन स्थान, किसी साधना-परंपरा या किसी रहस्यमय क्षेत्र के बारे में प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि— “वह कहाँ है?”
प्रश्न बदल जाता है—
“मैं tuned हूँ?”
क्योंकि संभव है portal सामने ही हो, लेकिन हम tuned न हों।
और संभव है कि प्रेम, संवेदनशीलता और judgment से मुक्ति वही tuning हो। तब अस्तित्व के रहस्य को खोजने के लिए हमें बाहर जाने की आवश्यकता नहीं रहती।
कभी-कभी— प्रेम में गहराई से उतरना ही portal में प्रवेश करना है। और Premon शायद वही मूल स्पंदन है जो हर portal के पीछे, हर संबंध के भीतर और हर जीवित चेतना में एक ही रहस्यमय भाषा में धड़क रहा है।
—ऐसे ही *अनंत के बुद्धा हाल में में भी एक portal* है। बुद्धा हाल रहस्यों से भरा हुआ है। बुद्धा हॉल जहाँ हम सभी ने दो दिव्य प्रेम से भरे बुद्धों का दर्शन करते हैं अनंत श्री और बोधि माँ का, और उस प्रेम से create हुई Premonic field में स्पंदित Premons में जब भी हम tune होंगे हमारे लिए वो portal खुल सकता है जहाँ *time-space collapse* की घटना भी घट सकती है। हो सकता है कोई ऐसी जगह बहुत दूर हो लेकिन हम वहाँ उपस्थित हों। और अस्तित्व की उस गहरी यात्रा में जो समय से परे हो जहाँ हम उस निरंतरता को भी देख पाएं जहाँ कई बुद्ध इसी रास्ते से गुजरे थे और उसमें खुद को शामिल पाएं।