प्रेम नेति नेति नहीं, येति येति है। येति येति ऐसे ही coin हुआ शब्द है समझने के लिए।
अनंत श्री से जो मैंने समझा —
लोगों ने प्रेम को अक्सर **“नेति नेति”** की भाषा में समझाने की कोशिश की है—
यह नहीं, वह नहीं।
यह छोड़ना है, उससे ऊपर उठना है, इसे निम्न समझना है और उसे उच्च।
लेकिन प्रेम की प्रकृति शायद इसके ठीक विपरीत है।
**प्रेम नेति नेति नहीं, येति येति है।**
प्रेम कहता है— यह भी, वह भी, जो समझ में आ रहा है, वह भी, जो अभी समझ में नहीं आ रहा, वह भी।
*अनंत श्री कहते हैं प्रेम **absolute yes** है।*
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रेम हर चीज़ को अंतिम सत्य घोषित कर देता है।
प्रेम का “हाँ” किसी अवस्था को पकड़ लेना नहीं है;
प्रेम का “हाँ” **उस क्षण जो है, उसे स्वीकार करके उससे आगे बढ़ने की अनुमति देना है।**
यही प्रेम की सबसे बड़ी खूबसूरती है। जो अभी समझ में नहीं आ रहा, उसे भी हाँ
मान लीजिए मुझे किसी बात की समझ नहीं है। मैं अगर अपने न समझने को अस्वीकार कर दूँ, तो क्या होगा?
मैं कहूँगा— “मुझे यह समझ में क्यों नहीं आ रहा?”
“मुझे तो यह पहले से समझना चाहिए था।” “यह अवस्था गलत है।” “मुझे इससे ऊपर होना चाहिए।”
और यहीं संघर्ष शुरू हो जाता है। लेकिन अगर मैं कहूँ—
**“अभी मैं नहीं समझ पा रहा हूँ—यह भी ठीक है।”**
तो मेरे भीतर एक जगह बनती है। अब मैं अपने न समझने के साथ उपस्थित हूँ। और संभव है कि उसी स्वीकार से अगली समझ का द्वार खुले।
इसलिए प्रेम केवल **समझ को yes नहीं कहता।**
प्रेम कहता है— **“मेरी नासमझी को भी yes।”**
क्योंकि शायद वही नासमझी अगली समझ की भूमि है।
बीज को यह पता नहीं होता कि वृक्ष क्या है। लेकिन क्या हम कहेंगे कि बीज गलत है क्योंकि वह अभी वृक्ष नहीं है?
नहीं।
**बीज का बीज होना ही उसके वृक्ष बनने की प्रक्रिया का पहला सत्य है।**
एक कदम ही अगले कदम का स्वीकार है, जीवन में कोई भी अगला कदम अचानक नहीं आता। जो कदम अभी हमारे सामने है, वही अगले कदम की भूमि तैयार करता है।
आप एक सीढ़ी पर खड़े हैं।
यदि आप पहली सीढ़ी को स्वीकार ही नहीं करेंगे,
तो दूसरी सीढ़ी पर पैर कैसे रखेंगे?
पहली सीढ़ी को छोड़कर सीधे तीसरी पर जाने की कोशिश करेंगे तो गिर सकते हैं।
इसलिए—
**एक कदम अगले कदम का स्वीकार है।**
और अगले कदम पर पहुँचकर पता चलता है कि पिछला कदम गलत नहीं था।
वह आवश्यक था।
बचपन गलत नहीं था क्योंकि वह बचपन था।
अज्ञान गलत नहीं था क्योंकि वह अज्ञान था।
प्रश्न गलत नहीं था क्योंकि उसके पास उत्तर नहीं था।
भ्रम भी यात्रा का हिस्सा हो सकता है, क्योंकि कभी-कभी भ्रम के भीतर से ही स्पष्टता जन्म लेती है।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर अवस्था में रुक जाना है।
बल्कि इसका अर्थ है—
**जिस जगह हो, उसे स्वीकार करो ताकि वहीं से आगे बढ़ सको।**
— कुछ लोग निम्न और उच्च की अवस्था बनाते हैं। कौन हैं ये लोग! कहाँ से आते हैं? 😊
यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न आता है।
हम कहते हैं—
यह निम्न है।
यह उच्च है।
यह चेतना की नीची अवस्था है।
यह ऊँची अवस्था है।
यह प्रेम का निम्न स्तर है।
यह प्रेम का उच्च स्तर है।
लेकिन प्रश्न है—
**यह तय कौन कर रहा है?** और किस आधार पर?
अस्तित्व में कुछ भी बिना कारण नहीं है,
तो जो अभी अस्तित्व में है, वह भी किसी यात्रा का हिस्सा है।
हम किसी घाटी को देखकर कह सकते हैं—
“यह नीचे है।”
लेकिन उसी क्षण प्रश्न उठता है—
**नीचे किसके संदर्भ में?**
क्योंकि यदि घाटी नहीं होगी तो शिखर को शिखर कहेंगे कैसे?
शिखर की पहचान ही घाटी के साथ संबंध में बनती है।
इसलिए घाटी शिखर की शत्रु नहीं है।
**घाटी शिखर की संभावना को दिखाई देती है।**
अंधकार प्रकाश का विरोधी नहीं है; प्रकाश को पहचानने की परिस्थिति भी वही बनाता है।
प्रश्न उत्तर का विरोधी नहीं है;
प्रश्न ही उत्तर के जन्म की भूमि है।
अज्ञान ज्ञान का दुश्मन नहीं है; कई बार वही ज्ञान की यात्रा का आरंभ है।
— *प्रेम तुलना नहीं करता, प्रक्रिया को देखता है* और सबकी प्रक्रिया यूनीक है और ये यूनीकनेस एक अस्तित्वगत गुरु *अनंत श्री* के ही उपस्थिति में हम देख सकते हैं वरना बाजार में कई गुरु हैं जो अपने जैसा ही बनाना चाहते हैं वो प्रेम को भी अपने परिभाषित प्रेम के चश्में से ही दिखाते हैं। और गहराई से देखें तो प्रेम को किसी चश्में की जरूरत नहीं बल्कि एक अस्तित्वगत गुरु *अनंत श्री* की उपस्थिति की जरूरत होती है जो कुछ करते नहीं बल्कि उनकी उपस्थिति ही प्रेम को बता देती है और प्रेम के कई कलर्स को हमारे सामने रख देती है।
प्रेम के कई चश्में बिक रहें है बाजार में
मीरा के प्रेम जैसा, कबीर के प्रेम जैसा, कोई गुरु अपना टैग लगा कर बेंच रहे हैं,
लेकिन प्रेम without tag है वो निरंतर गहराई में जाती धारा आने वाले समय में और गहरी परतें हटेंगी। इसीलिए अनंत श्री इन सारे टैग को हटा देते हैं क्योंकि ये टैग सीमा बनाते हैं।
जब हम “निम्न” और “उच्च” की श्रेणियाँ बनाते हैं, तो अक्सर हम किसी क्षण को पूरी यात्रा से काटकर देखने लगते हैं।
लेकिन प्रेम किसी क्षण को अकेला नहीं देखता।
वह **प्रक्रिया** को देखता है।
एक बच्चा चलना सीख रहा है। वह गिरता है।
क्या प्रेम कहेगा— “तुम गिर गए, इसलिए तुम निम्न हो”?
नहीं। गिरना भी चलना सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है।
वह गिरने को स्वीकार करता है, उससे सीखता है और फिर उठता है।
इसीलिए प्रेम का acceptance निष्क्रियता नहीं है।
**स्वीकार करना रुकना नहीं है। स्वीकार करना आगे बढ़ने की जमीन बनाना है।**
— अब इसे भावनाओं पर लागू करके देखें।
मान लीजिए किसी व्यक्ति के भीतर क्रोध है।
हम तुरंत कह सकते हैं—
“क्रोध गलत है।”
“क्रोध निम्न है।”
“प्रेम उच्च है।”
“इसलिए क्रोध छोड़ो और प्रेम में आओ।”
लेकिन प्रेम जो **absolute yes** है, तो वह क्रोध को भी देखने की अनुमति देगा।
वह कहेगा—
**“अभी मेरे भीतर क्रोध है। इसे भी देखता हूँ।”**
न उसे महिमामंडित करना है,
न दबाना है,
न उससे अपनी पहचान बनानी है।
बस उसे पूरी जागरूकता से स्वीकार करना है।
और तब कुछ दिखाई दे सकता है—
क्रोध के नीचे चोट हो सकती है।
चोट के नीचे भय हो सकता है।
भय के नीचे कोई अधूरी आवश्यकता हो सकती है।
और उसके नीचे शायद प्रेम की कोई पुकार हो।
अब क्रोध शत्रु नहीं रहा।
**वह प्रेम की सीढ़ी बन गया।**
प्रेम ने क्रोध को समाप्त करने से पहले उसे समझने की जगह दी।
यही येति येति है।
लेकिन यदि वह कहता है—
“क्रोध प्रेम नहीं है, इसलिए इसे हटाना है,” तो वह अपने अनुभव के एक हिस्से को प्रेम की सीमा से बाहर कर देता है। और जब प्रेम की सीमा से कोई चीज़ बाहर हो जाती है, तो प्रेम की संपूर्णता भी सीमित हो जाती है।
इसलिए प्रेम कहता है—
**क्रोध को भी मेरी जागरूकता में आने दो।
दुःख को भी।
ईर्ष्या को भी।
भय को भी।
असुरक्षा को भी।**
इसका अर्थ यह नहीं कि क्रोध में जाकर किसी को चोट पहुँचाना प्रेम है।
यह बहुत महत्वपूर्ण अंतर है।
**भावना को स्वीकार करना और उसके हर व्यवहार को सही ठहराना अलग बातें हैं।**
प्रेम क्रोध को जगह देता है ताकि क्रोध को समझा जा सके; और बात समझते व्यवहार बदल जाता है।
यही स्वीकार और रूपांतरण का अंतर है।
— यदि क्रोध घटा, तो क्या प्रेम भी घटेगा?
यहाँ एक और सूक्ष्म प्रश्न है।
यदि कोई व्यक्ति कहता है—
“मैं क्रोध को पूरी तरह निकाल दूँगा, तब मैं प्रेम में रहूँगा,”
तो संभव है कि वह अपने भीतर के एक हिस्से को ही प्रेम से बाहर कर दे।
लेकिन यदि वह क्रोध को समझते हुए उसकी ऊर्जा को रूपांतरित करता है, तो प्रेम की रेंज विस्तृत हो सकती है।
तब बात यह नहीं रह जाती कि—
**क्रोध कम और प्रेम ज्यादा।**
बात यह हो जाती है कि—
**जिस चेतना में पहले केवल क्रोध दिखाई देता था, उसी चेतना में अब क्रोध को भी देखा जा सकता है और उसके भीतर छिपे प्रेम को भी।**
यानी प्रेम ने क्रोध को हराया नहीं। **प्रेम ने क्रोध को अपने भीतर समझ लिया।**
यही विस्तार है।
—घाटी को मिटाकर शिखर नहीं बनता, हम अक्सर आध्यात्मिक जीवन में चाहते हैं कि घाटियाँ गायब हो जाएँ और केवल शिखर रह जाएँ।
लेकिन अगर हर चीज़ को तुरंत “उच्च” बनाना है, तो जीवन की प्रक्रिया छूट जाती है।
शिखर इसलिए शिखर है क्योंकि यात्रा में घाटियाँ भी हैं। रात इसलिए रात है क्योंकि दिन है।
मौन इसलिए मौन है क्योंकि शब्द हैं।
प्रश्न इसलिए प्रश्न है क्योंकि उत्तर की संभावना है।
और यात्रा इसलिए यात्रा है क्योंकि हम अभी वहाँ नहीं पहुँचे हैं जहाँ जाना है।
इसलिए प्रेम यात्रा के किसी पड़ाव से कहता नहीं—
**“तुम्हें यहाँ नहीं होना चाहिए था।”**
वह कहता है—
**“तुम यहाँ हो।
ठीक।
अब यहीं से आगे चलते हैं।”**
यही acceptance है।
—अस्तित्व में कुछ भी बिना कारण नहीं,
यदि हम यह मानते हैं कि अस्तित्व की हर घटना एक विराट परस्पर जुड़ी प्रक्रिया का हिस्सा है, तो हमें सावधान होना होगा कि हम किसी एक क्षण को अंतिम निर्णय न बना दें।
किसी व्यक्ति की वर्तमान अवस्था को देखकर यह तय कर देना कि—
“यह निम्न है,”
“यह उच्च है,”
“यह जागा हुआ है,”
“यह सोया हुआ है,”
अक्सर उस व्यक्ति की पूरी यात्रा को एक क्षण में बाँध देना है।
हम किसी के **एक पड़ाव** को देख रहे हैं।
अस्तित्व उसकी **पूरी यात्रा** देख रहा हो सकता है।
इसलिए प्रेम निर्णय से पहले समझने की जगह बनाता है।
— प्रेम का “हाँ” हर चीज़ को अंतिम नहीं बनाता
यह सबसे महत्वपूर्ण बात है।
**Absolute yes का अर्थ यह नहीं कि जो अभी है, वही हमेशा रहेगा।**
बल्कि इसका अर्थ है—
**“जो अभी है, मैं उसे अस्वीकार नहीं करता; इसलिए मैं उसके भीतर से अगले को जन्म लेने देता हूँ।”**
बीज को स्वीकार करना वृक्ष को रोकना नहीं है।
बचपन को स्वीकार करना वयस्क होने को रोकना नहीं है।
अज्ञान को स्वीकार करना ज्ञान को रोकना नहीं है।
क्रोध को स्वीकार करना प्रेम को रोकना नहीं है।
दुःख को स्वीकार करना आनंद को रोकना नहीं है।
**स्वीकार ही रूपांतरण की पहली भूमि है।**
— और शायद यही प्रेम का रहस्य है
नेति नेति में हम कहते हैं—
**यह नहीं।
यह भी नहीं।**
येति येति में हम कहते हैं—
**यह भी।
वह भी।
अभी जो है, वह भी।
जो आगे आएगा, वह भी।**
लेकिन अंततः यह “सब कुछ सही है” जैसी सतही बात नहीं है।
यह उससे कहीं गहरी बात है—
**अस्तित्व को उसकी प्रक्रिया सहित स्वीकार करना।**
क्योंकि कोई भी कदम अकेला नहीं है।
**आज का कदम कल की जमीन है।
आज की समझ कल की समझ का द्वार है।
आज का न समझना भी कल की समझ की संभावना है।
आज की घाटी ही कल के शिखर को अर्थ देती है।**
इसलिए प्रेम किसी अवस्था को तुच्छ नहीं करता।
वह उसे उसकी जगह देता है।
और फिर धीरे से कहता है—
**“हाँ।
यह भी।
चलो, अब अगला कदम।”**
यही— **येति येति।**
**प्रेम का absolute yes।**
न भागना।
न दबाना।
न किसी अवस्था को अंतिम मान लेना।
**जो है, उसे पूरी तरह स्वीकार करना—
और उसी स्वीकार से जो अगला जन्म लेना चाहता है, उसे जन्म लेने देना।**
यही प्रेम की यात्रा है। **प्रेम मंज़िल को ही नहीं,
हर कदम को हाँ कहता है।**
और शायद इसलिए प्रेम में कोई कदम व्यर्थ नहीं होता।
कई लोग प्रेम में eligibility तलाशते हैं कौन तय करेगा कोई व्यक्ति, कोई मास्टर शायद कोई तय नहीं कर सकता, गुरु जी कहते हैं **प्रेम के लिए कोई eligibility नहीं चाहिए।**
अगर प्रेम के लिए पात्रता चाहिए, तो फिर प्रेम **absolute yes** नहीं रह जाता; वह शर्त बन जाता है—“पहले ऐसा बनो, फिर प्रेम मिलेगा।”
प्रेम तो शायद ठीक उलटा है।
**तुम जैसे हो, वहीं से प्रेम शुरू हो सकता है।**
तुम्हारे भीतर क्रोध है—वहीं से।
भय है—वहीं से।
नासमझी है—वहीं से।
अहंकार है—वहीं से।
तुम टूटे हुए महसूस कर रहे हो—वहीं से।
प्रेम पहले यह नहीं पूछता कि **“तुम योग्य हो या नहीं?”**
वह कहता है—
**“तुम हो—बस इतना पर्याप्त है।”**
क्योंकि अगर प्रेम कहता है **“यह भी”**, तो वह आपकी वर्तमान अवस्था को भी अपनी यात्रा में जगह देता है। फिर कोई बाहरी व्यक्ति यह प्रमाणपत्र कैसे दे सकता है कि—
“तुम अभी प्रेम के योग्य नहीं हो।”
“तुम्हारी चेतना निम्न है।”
“पहले तुम्हें इतना शुद्ध होना पड़ेगा।”
“पहले तुम्हें यह अवस्था प्राप्त करनी होगी।”
**कौन तय करेगा?**
हाँ, किसी व्यवहार के परिणाम हो सकते हैं। किसी कर्म से दूसरे को चोट पहुँच सकती है। किसी आदत को बदलना आवश्यक हो सकता है। लेकिन किसी व्यक्ति को प्रेम से बाहर घोषित करना और उसके व्यवहार को समझकर या कहें प्रेम के माध्यम से बदलना—ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
प्रेम कहता है—
**“जो है, उसे देखो।
उसे स्वीकारो।
उससे सीखो।
और फिर आगे बढ़ो।”**
इसलिए प्रेम में **eligibility नहीं, presence ** महत्वपूर्ण है—क्या तुम इस क्षण जो है, उसके प्रति उपस्थित हो सकते हो?
और शायद सबसे सुंदर बात यह है:
**प्रेम पाने के लिए पहले प्रेम के योग्य होना जरूरी नहीं।
कई बार प्रेम में आना ही वह प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य प्रेम को जीने योग्य बनता जाता है।**
यानी— **पात्रता प्रेम की पूर्वशर्त नहीं है;
प्रेम स्वयं पात्रता को जन्म देने वाली यात्रा है।**
और तब “येति येति” का अर्थ और खुलता है—
**तुम भी।
तुम्हारी वर्तमान अवस्था भी।
तुम्हारी यात्रा भी।
तुम्हारा अगला कदम भी।**
कुछ लोग प्रेम में कोई बहुत बड़ी घटना ही खोजते हैं लेकिन वो प्रोसेस से चूक जाते हैं वो उस प्रक्रिया को प्रेम से बाहर कर देते हैं **प्रेम हमेशा कोई बहुत बड़ी आध्यात्मिक घटना नहीं होता।**
किसी के साथ बैठकर दो कप चाय पीना, साथ में रसगुल्ला खाना, बिना किसी खास विषय के बातें करना, या कुछ देर बस साथ बैठना—ये सब भी प्रेम के बहुत सरल रूप हो सकते हैं।
प्रेम की गहराई इस बात से तय नहीं होती कि **हमने साथ में क्या किया**, बल्कि इस बात से होती है कि **उस क्षण हम कितने उपस्थित थे।**
किसी के साथ दो कप चाय—
अगर उसमें कोई जल्दी नहीं,
कोई उपयोग नहीं,
कोई हिसाब नहीं,
कोई उपलब्धि नहीं—
बस **“तुम हो और मैं तुम्हारे साथ हूँ”**,
तो वह भी प्रेम है।
रसगुल्ला भी प्रेम हो सकता है।
एक व्यक्ति दूसरे से कहे—
**“लो, तुम्हें पसंद है न।”**
और उस छोटे-से “लो” में दूसरे की पसंद को याद रखना, उसकी खुशी में अपनी खुशी देखना—वहाँ प्रेम है।
प्रेम हमेशा **बड़े त्याग, बड़े शब्द, ध्यान, समाधि या आध्यात्मिक अनुभव** में ही नहीं मिलता।
कभी वह चाय के कप की भाप में है।
कभी आधे रसगुल्ले को बाँटने में।
कभी किसी के लिए कुर्सी खींच देने में।
कभी यह पूछने में—
**“चाय लोगे?”**
और शायद यही **येति येति** है—
**यह भी प्रेम।
वह भी प्रेम।
ध्यान भी प्रेम।
हँसी भी प्रेम।
मौन भी प्रेम।
दो कप चाय भी प्रेम।
एक रसगुल्ला भी प्रेम।**
क्योंकि प्रेम किसी अनुभव की ऊँचाई का नाम नहीं है।
**जिस क्षण में हम पूरे होकर उपस्थित हैं, वही क्षण प्रेम का हो सकता है।**
और तब जीवन का साधारण भी असाधारण हो जाता है।
**कभी प्रेम मंदिर में नहीं,
दो कप चाय के बीच बैठा होता है।**
😎 कुछ लोग अगर कोई आशिक बना बैठा है, किसी के लिए तड़पता है,तो कहते हैं वो क्या जाने प्रेम क्या है? उसको चलने नहीं आता ठीक से वो क्या जानेगा प्रेम को और प्रेम की बातें करता है—
लेकिन प्रेम कहता है यह भी उसकी यात्रा का एक पड़ाव है। वह प्रेम को अभी **एक व्यक्ति, एक संबंध, एक चाहत या एक विरह** के माध्यम से जान रहा हो सकता है।
यह कहना कि “यह प्रेम नहीं है, यह तो मोह है” बहुत जल्दी किया गया निष्कर्ष हो सकता है। हो सकता है उसमें मोह भी हो, आकर्षण भी हो, अपेक्षा भी हो और उन्हीं के बीच प्रेम की कोई वास्तविक झलक भी हो।
असल प्रश्न यह नहीं कि **“तुम्हारा प्रेम शुद्ध है या अशुद्ध?”**
प्रश्न यह है—
**“तुम जिस प्रेम में हो, उसे कितनी जागरूकता से जी रहे हो?”**
क्योंकि वही आशिक आगे चलकर देख सकता है—
कल तक मैं उसे पाना चाहता था, आज मैं उसे समझना चाहता हूँ।
कल तक प्रेम मेरे लिए “तुम मेरे हो” था, आज प्रेम होने लगा—“तुम जैसे हो, वैसे रहो।”
कल तक विरह केवल पीड़ा था, आज वही विरह मेरे भीतर किसी गहरी संवेदना का द्वार बन गया।
क्योंकि कौन जानता है—
**जिसे आज हम प्रेम की शुरुआती सीढ़ी समझ रहे हैं, वही कल उसके लिए प्रेम के किसी बहुत व्यापक आयाम का द्वार बन जाए।**
**प्रेम व्यवहार को अस्वीकार नहीं करता, लेकिन गहरा प्रेम व्यवहार को बदल देता है या कहें गहरे प्रेम की उपस्थिति व्यवहार की गुणवत्ता को बदल देता है।**
येति येति** का अर्थ है— व्यक्ति को स्वीकार करो उसके अनुभव को स्वीकार करो, उसकी वर्तमान अवस्था को स्वीकार करो—लेकिन उसी स्वीकार के भीतर व्यवहार को और अधिक प्रेमपूर्ण होने की संभावना के लिए खुला रखो। प्रेम व्यक्ति को अस्वीकार नहीं करता, व्यवहार को विकसित करता है।
प्रेम का **absolute yes** स्थिर नहीं है। उसमें विकास की संभावना है।
आज मैं प्रेम को इस तरह व्यक्त कर पा रहा हूँ।
कल शायद थोड़ा अधिक समझ के साथ करूँगा।
फिर किसी दिन मेरी उपस्थिति में सामने वाले को अधिक स्वतंत्रता, अधिक सम्मान, अधिक सुरक्षा और अधिक सहजता मिलेगी।
तो प्रेम की गुणवत्ता बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि—
**“कल का प्रेम नकली था।”**
बल्कि—
**“कल प्रेम की जितनी समझ थी, आज उसकी रेंज थोड़ी और खुल गई।”**
जैसे बच्चा पहले हाथ पकड़कर चलता है, फिर स्वयं चलता है, फिर दौड़ता है।
पहला कदम गलत नहीं था।
**वह अगले कदम की जमीन था।**
— इसलिए प्रेम का मूल्यांकन “ऊँच-नीच” से नहीं, “विस्तार” से है।
हमें यह तय करने की जरूरत नहीं कि—
“यह प्रेम उच्च है और यह निम्न।”
बल्कि हम देख सकते हैं—
**क्या इस प्रेम की रेंज बढ़ रही है?** क्या इसमें गहराई आ रही है?
क्या इसमें दूसरे की स्वतंत्रता के लिए जगह बढ़ रही है?
क्या समझ बढ़ रही है?
क्या दूसरे को अपने जैसा बनाने की जरूरत कम हो रही है?
क्या प्रेम अब केवल **“मुझे क्या चाहिए”** से आगे बढ़कर **“तुम्हारे होने के लिए कितनी जगह है”** बन रहा है?
अगर हाँ, तो प्रेम का विस्तार हो रहा है।
और कई बार अगर प्रेम है तो रिश्तों से एक दूसरे को अलग हो जाने की इजाजत भी देता है।
**मैं तुम्हें वहीं स्वीकार करता हूँ जहाँ तुम हो,
लेकिन तुम्हें वहीं रोकता नहीं।**
मैं अपने वर्तमान को भी स्वीकार करता हूँ,
लेकिन उसे अंतिम नहीं मानता।
इसलिए प्रेम कहता है— **“तुम जैसे हो, तुम्हारे लिए जगह है। और क्योंकि तुम्हारे लिए जगह है, तुम बदल भी सकते हो।”**
यही प्रेम का **absolute yes** है—
**स्वीकार भी, विकास भी;
करुणा भी, सजगता भी;
व्यक्ति के प्रति पूर्ण हाँ,
और व्यवहार को अधिक प्रेमपूर्ण बनाने की निरंतर यात्रा।**