अनुयायी और विरोधी, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जो किसी का अनुयायी होता है वो अनिवार्य रूप से किसी का विरोधी होता है।
किसी के प्रेम में होना बिलकुल अलग बात है। तुम मुझसे प्रेम तो करो लेकिन मेरे अनुयायी न बनना। अनुसरण की कोई आवश्यकता नहीं है। वो व्यर्थ की प्रक्रिया है। अनुयायी निरंतर उसे बड़ा सिद्ध करने की कोशिश करता है जिसका वो अनुसरण कर रहा होता होता है, और उसे छोटा करने की कोशिश करता है जो उसके अनुसरण को या उसकी धारणाओं को चुनौती देता प्रतीत होता है। किसी को बड़ा सिद्ध करने का भाव, किसी को छोटा सिद्ध करने के भाव के साथ ही होता है। यह एक प्रकार की मानसिक अपरिपक्वता है। जब अनुयायी कहता है कि मेरा गुरु सबसे महान है, तो उसका कथन तुलनात्मक होता है, जिसमें किसी अन्य के कम महान होने की घोषणा भी छिपी होती है।
एक प्रेमी भी कहता है कि मेरा गुरु सबसे महान है, लेकिन तब यह मात्र प्रेम की एक भावपूर्ण अभिव्यक्ति होती है जो बिलकुल भी तुलनात्मक नहीं होती। प्रेम की घटना एक गहरी मानसिक परिपक्वता से घटती है।
एक प्रेमी किसी के भी विरोध में नहीं होता। वो तो अपने आनंद में डूबा होता है। अनुयायी के जीवन में प्रेम का घटना बहुत कठिन हो जाता है, हालाँकि वो लगातार प्रेम की बातें कर रहा होता है। अनुयायी के प्रेम में सूक्ष्म हिंसा होती है, जो कभी भी स्थूल रूप ले सकती है। सारा इतिहास अनुयाइयों की इस हिंसा से दागदार है। न किसी को बड़ा सिद्ध करो और न किसी को छोटा। बस अपने प्रेम में डूबो और जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करो।
Wao!
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गूढ़ अंतर्दृष्टि को हमारे लिए आपने प्रस्तुत किया।इसके लिए प्रेम और आभार 🪷🌺🌹💐
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Pranam Gurudev
Gratitude for unravelling the truth of unconditional love