जीवन का सार व तर्कों का तर्क,अतर्क है प्रेम- Anant Sangha…
जीवन का सार व तर्कों का तर्क,अतर्क है प्रेम- Anant Sangha…
🌻जीवन का सार व तर्कों का तर्क,अतर्क है प्रेम 🌻
गुरु ही है प्रेम में प्रवेश का द्वार,
वो ही है जीवन का साक्षी व सार।
तर्कों का भी तर्क,अतर्क यही—
जो अंतर्मन को सहज छू जाए,
शब्द जहाँ सब यूँही मौन हो जाएँ,
वही प्रेम सत्य में ठहरकर मुस्काए।
प्रश्न बहुत थे मन के भीतर,
उत्तर खोजता रहा मन,
गुरु-सान्निध्य में ठहर गया तो
मिट गया प्रश्नों का कंपन।
गुरु ने कुछ ऐसा नहीं कहा,
बस अपनी उपस्थिति दी,
उस मौन प्रेम की छाँव तले
मैंने अपने होने की सुध ली।
जो “मैं” था, वह धीरे-धीरे गलकर
“तू” में ऐसे खोता गया,
द्वैत किनारे बैठा रह गया,
अद्वैत भीतर होता गया।
तर्क जहाँ तक साथ निभाए,
वहाँ तक उसका मान रहे,
पर प्रेम जहाँ स्वयं उतर आए,
वहीं स्वयं में सर्व का प्रमाण रहे।
प्रेम न कोई उत्तर माँगे,
प्रेम न कोई प्रश्न करे,
जिसमें “मैं” और “तू” न बचें—
वही प्रेम समाधि भरे।
न पाने की कोई चाह रहे,
न खोने का कोई भय हो,
जो घटता है, सहज घटे बस—
हर पल में स्वीकार की लय हो।
गुरु की आँखों की निस्तब्धता
जैसे कोई गहरा द्वार,
जिसमें झाँका तो दिखा—
मैं ही था उस पार।
तब जाना—
समाधि कहीं दूर नहीं,
समाधान कोई शब्द नहीं;
जब प्रेम में स्वयं को सौंप दिया,
तो बचा ही क्या—
जो है, वही मैं हूँ,
और जो मैं हूँ, वही प्रेम है।
यही तर्क का अंतिम भाव,
यही जीवन का सार—
गुरु-सान्निध्य में मिटता “मैं”,
और प्रेम में मिलता संसार।
अब न कोई दूरी शेष रही,
न कोई अपना-पराया,
हर श्वास में गुरु का स्पर्श,
हर धड़कन ने नाम तुम्हारा गाया।
जहाँ देखूँ, तेरा ही रूप,
जहाँ सुनूँ, तेरा ही स्वर,
कण-कण में तेरी करुणा झरे,
मन हो जाए निर्मल सरोवर।
तेरे चरणों में रख दी मैंने
अपनी सारी थकान,
तू ही पथ है, तू ही पथिक,
तू ही मेरा परम मकान।
अब लौटूँ भी तो कहाँ लौटूँ,
तू ही घर और तू ही द्वार,
तेरे प्रेम में विलीन हुआ जो,
वही मेरा सच्चा संसार।
न शब्द रहें, न मौन अलग हो,
न साधक, न साधन, न ध्यान,
प्रेम स्वयं जब प्रेम को पाए,
पूर्ण हो जाए जीवन-गान।
प्रेम ही समर्पण, प्रेम ही मुक्ति,
प्रेम ही भक्ति,प्रेम ही परम धाम,
जब मिटे- मैं का अंधियारा,
तब प्रेम ही हो मेरा प्रमाण।
प्रेम में ही है जीवन का सच्चा अर्ध,
प्रेम बिना ही जीवन में सब है व्यर्थ,
प्रेम है तर्क के साथ भाव प्रधान,
प्रेम में ही है शांति व समाधान।
गुरु प्रेम ही है और वो ही परम आकर्षण,
गुरु सानिध्य में ही है शांति और समर्पण ।
प्रेम ही जीवन का संचार है जो कि अकारण व अनंत है और प्रेम ही जीवन का अंतरसंबन्धित बहाव है। प्रेम ही विराट जीवन की रहस्यमय लीला है और प्रेम ही शून्यता में पूर्णता का नृत्य है। प्रेम ही मन का मौन व जीवन की जीवंतता है। प्रेम ही रहस्यमय जीवन का केंद्र है और प्रेम ही गुरु व गोविंद है।प्रेम ही अद्वैत है और जीवन के द्वैत में एकत्व का बोध है । प्रेम ही परम ठहराव है और प्रेम ही जीवन के बहाव में श्रृद्धा, सर्वस्वीकार व समर्पण में विश्राम है। प्रेम ही जीवन का मूल आधार है और प्रेम ही रहस्यमय परमात्मा का द्वार व सहस्रार है। प्रेम ही परम मार्ग, मार्गदर्शन और मंजिल है और प्रेम ही श्रृद्धा, सर्वस्वीकार और समर्पण है। प्रेम ही परम विवेक है और प्रेम ही शांति, प्रसन्नता व समस्वरता का दिव्य संदेश है।
अनंतश्री व बोधि माँ के सानिध्य में समझा व महसूस किया जीवन का यही सार है।
अनंत संघ के सभी मित्रो को प्रेमपूर्ण प्रणाम!
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