शिव नेत्र

शिव नेत्र- Anant Sri

शिव नेत्र अर्थात शिव की तीसरी आँख, द्वैत से पार उठ गयी अद्वैत की दृष्टि है. दो आँखें कामना से भरी दृष्टि का प्रतीक हैं और तीसरी आँख निष्कामना  का. कामनाएं अर्थात इच्छाएं निरंतर चुनाव में ले जाती हैं. इसके लिए दो आँखें चाहिए जो चुनाव कर सकें की क्या चाहिए और क्या नहीं चाहिए, क्या अच्छा है और क्या बुरा है. दो आँखें भेद की दृष्टि हैं और तीसरी आँख अभेद की दृष्टि है.

तीसरी आँख का वही अर्थ है जिसे जे.कृष्णमूर्ति चुनाव रहित सजगता कहते हैं, अर्थात अब चेतना चुनाव से ऊपर अचुनाव में, भेद से ऊपर अभेद में, द्वैत से ऊपर अद्वैत में ठहर गयी है.

शिव अपनी दोनों आँखें बंद करके समाधि में लीन रहते हैं और जरुरत पड़ने पर तीसरी आँख खोलते हैं. जब कामदेव अर्थात कामनाओं की सत्ता, शिव के ऊपर अपना बाण चलाते हैं तब शिव की दोनों आँखें तो बंद रहती हैं किन्तु तीसरी आँख खुलती है और काम जलकर राख हो जाता है.

एक साधक भी जब तक द्वैत, भेद और चुनाव की दृष्टि से भरा होता है तो काम उसका पीछा करता है और उसे मार्ग से भटकाता है. और जब साधक शिव की तरह द्वैत, भेद और चुनाव की आँखें बंद कर लेता है और चुनावरहित, भेदरहित व द्वैतरहित सजगता की तीसरी आँख खुलने देता है तो उसे पीड़ित करने वाली काम की सत्ता समाप्त हो जाती है और वह आनंद के लोक में प्रवेश कर जाता है. इसी शिव नेत्र को सभी साधकों को उपलब्ध होना है.

This Post Has 6 Comments

  1. परमवीर

    तीसरी आंख की तरह अद्भुत है ये अद्वैत…. सद्गुरु के प्रति एक अहोभाव ❤️❤️🙏🏻🪷🪷

  2. अनीता

    🙏🙏🙏

    1. Ravi

      🔱🙏😌💛🌻

    1. Meera Gopalan

      🙏

  3. Sunanda

    🍀🌺🍀🌺🍀🌺

Leave a Reply