Inner Reflection of Anant Sangha- Being, Doing & Having Anant Sri Podcast

BEING → DOING → HAVING – The ultimate trilogy of life, A doorway to fulfillment.

🪷 🪷 वजूद में उतरना…बहाव में बहना…जीवन के मुकम्मल होने का गहरा राज़

🪷 अब तक अध्यात्म में हमने अक्सर बहुत भारी-भरकम शब्द और सूत्र देखे हैं। तथाकथित अध्यात्म ने हमें हमारे ही जीवन से इतना दूर कर दिया, कि हमने एक काल्पनिक जगत रच लिया। हमें बताया गया— शांति हिमालय की ख़ामोशियों में मिलेगी, मंदिर की घंटियों में मिलेगी, किसी नदी में एक डुबकी लगा लेने से मिलेगी। बाहर के ये स्थान भी ख़ूबसूरत हैं—निर्मल है, पवित्र है। मगर वह जीवन नहीं है जिसे हम रोज़ जीते हैं। एक नदी हमारे भीतर भी बहती है… उस नदी में डुबकी लगाने का हुनर सिर्फ़ मुर्शिद से मिलता है।

हमारे Modern Buddha अनंत श्री जी ने एक और अद्भुत और गहरे Podcast के माध्यम से जीवन को समझने और समृद्ध बनाने का अद्भुत सूत्र, एक बेहद Practical Formula हमारे सामने रखा है। कोई कठिन शास्त्र नहीं, कोई दूर का रहस्य नहीं, बल्कि जीवन को जीने का एक बेहद सरल, मगर गहरा सूत्र।

🪷🪷 The ultimate trilogy of life 🪷

🪷 🪔BEING 🪔DOING 🪔HAVING

जीवन के व्यापक आयामों को हम अपने Spiritual Einstein के साथ प्रतिदिन थोड़ा और स्पष्ट, थोड़ा और जीवंत और थोड़ा और ख़ुशहाल होते देख रहे हैं। पहली बार ये तीन शब्द केवल कोई philosophy नहीं लगते…बल्कि जीवन को शुभता, श्रेष्ठता और सुंदरता से जीने का अद्भुत कौशल है,और एक जीवंत विज्ञान हैं।

🪷 अनंत श्री अक्सर कहते हैं— “The Ultimate Meditation is to stay in your Inner Stillness.” इसी बात को उन्होंने एक और व्यापक दृष्टि दी है— जब हम अपने BEING की गहराइयों को जानने लगते हैं , उससे जुड़ने लगते हैं, तो वह जुड़ाव सिर्फ़ भीतर ठहरकर नहीं रह जाता… वह धीरे-धीरे हमारे DOING में उतरने लगता है। फिर कर्म होता है, मगर कर्ता का बोझ नहीं होता। “मैं कर रहा हूँ” की अकड़ नहीं होती। इसे शायद अकर्ता होना कह सकते हैं, या साक्षी होना — कुछ करने का भार नहीं, कुछ सिद्ध करने की बेचैनी नहीं…बस एक सहजता, एक सजगता, एक मौन-सा प्रवाह— और हमसे होता चला जाता है।

फिर यही DOING , धीरे-धीरे हमारी HAVING बन जाता है। मगर तब HAVING का अर्थ सिर्फ़ कुछ पा लेना नहीं रह जाता। वहाँ जो मिलता है, वह किसी वस्तु की तरह हाथ में नहीं आता— वह एक Essence है। 🌼एक एक परिपूर्ण जीवन… 🌼एक निर्भार जीवन… 🌼एक शांति.. 🌼एक बेफ़िक्री.. जिसमें पाने को कुछ शेष नहीं और खोने का भय भी नहीं। शायद यहीं कृष्ण का निष्काम कर्म एक जीवंत अनुभव बन जाता है। कर्म बहते रहते हैं, मगर फल की बेचैनी नहीं रहती। क्योंकि कर्म ही इतना आनंदमय हो गया है, फिर HAVING किसी चीज़ के मिल जाने का नाम नहीं रह जाता…जीवन स्वयं ख़ूबसूरत लगने लगता है। वही सुबह, वही रास्ते, वही रिश्ते, वही काम, वही छोटी-छोटी बातें… बाहर कुछ भी नहीं बदला होता… मगर देखने वाला बदल चुका होता है। सिर्फ़ दृष्टि नहीं बदलती, द्रष्टा भी बदल जाता है। अक्सर हम कहते हैं— हम विचारों का उपयोग करते हैं…मगर ज़रा भीतर झाँककर देखें तो क्या विचार ही हमें इस्तेमाल कर रहे हैं? हम भावनाओं को महसूस करते हैं, मगर कभी-कभी भावुकता हमें निगल जाती है। वस्तुएँ हमारी गुलाम होंगी— ऐसा सोचते हैं हम, कहीं हम ही तो उनके गुलाम नहीं हो गए? लेकिन जब जीवन में गुरु की सन्निधि में प्रेम से बैठना होता है…जब किसी जागे हुए कारवाँ के साथ बस हो लेना होता है और फिर जाने कब अंदर की सल्तनत बदल गई होती है। 🌼ख़याल आए—मगर अब हुक्म न चला सके। 🌼जज़्बात उठते हैं—मगर अब अपने साथ बहा नहीं ले जाते। 🌼वस्तुएँ पास रहती हैं—मगर अब दिल उनकी गिरफ़्त में नहीं होता। क्योंकि जब एक जागे हुए शहंशाह जीवन में गुरु के रूप में मौजूद हो… फिर बाहर की सल्तनत चाहे जैसी हो—भीतर कोई दरिद्र नहीं रहता।

अनंत संघ

Leave a Reply