ज्ञान और सत्य तुम्हें दिया नहीं जा सकता है। बाहर से कोई सत्य नहीं दे सकता, न शास्त्र, न गुरु, कोई भी तुम्हें ज्ञान नहीं दे सकता। एक सद्गुरु तुम्हारी प्यास को उकसाने का काम कर सकता है। जाग्रत मित्रों का सान्निध्य तुम्हारे साथ बस एक काम करता है, तुम्हारी प्यास को भड़का देता है। उसके भीतर परम सत्य का जो अवतरण हो चुका है, उसकी तरंगें चारों ओर बिखर रही होती हैं। तुम उन तरंगों के संपर्क में आते हो और अचानक तुम्हारे जीवन में एक नई दिशा प्रारम्भ हो जाती है। तुम किसी नई बात के लिए प्यासे हो उठते हो। यह नई प्यास जागृति की, स्वयं को जानने की होती है, और यह सौभाग्य का विषय है। प्यास भड़कती है तो वह स्वयं ही अपना पथ गढ़ती है। पथ कहीं बना बनाया नहीं है।
सद्गुरु पानी का स्रोत है। वह तृप्ति है और वहां तक पहुंचना होता है जब तुम्हारी प्यास गहरी और वास्तविक होती है। प्रामाणिक प्यास तभी जगती है जब तुम शिष्यत्व को तराशते हो, अपने कौतुहल को गिराते हो, अपनी जिज्ञासा से मुमुक्षुत्व में छलांग लेते हो, अपने अज्ञान के बोध को अपने भीतर घटने देते हो, अपने बंधनों को अनुभव कर लेते हो और अपने ऊपर निरंतर ओढ़े जाते हुए चेहरों के प्रति सतर्क और सजग हो जाते हो। शिष्यत्व की तैयारी केवल इतनी ही है कि तुम उन चेहरों के प्रति सजग हो जाते हो और उन्हें उतार कर अपने वास्तविक चेहरे को देखना प्रारम्भ करते हो। तब तुम उस तृप्ति के स्रोत की ओर खींच लिए जाते हो।
तुम्हारी प्यास और तृप्ति में एक रिश्ता है। हर प्यासे को पानी मिलता है, यह तय है। जो भी सत्य के लिए प्यासा है उसे सत्य मिलता है। यह तय है क्योंकि तृप्ति में और प्यास में एक जोड़ है।
“प्यास की चरम अवस्था तृप्ति में बदल जाती है।”
“सत्य के लिए गहरी प्यास तुम्हें सत्य की ओर खींच लेती है और सत्य में रूपांतरित कर देती है।”
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हार्दिक आभार गुरुदेव।🙏🌹🙏
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Guruge prnam Bitar k akash me ham kabtak thara
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🙏🙏💐Nice