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समंदर पी लिया
एक बूँद पीना था
पर समंदर पी लिया,
जिस तरह जीना था
उस तरह ही जी लिया।
विनाश की लीला में
अविनाशी साथ चलता रहा,
साथ उसके चलते-चलते
साथ मेरे कारवाँ चल दिया,
जब सब कुछ ठहरा था
तभी सब कुछ चल दिया।
अंतरतम से उठी एक लपट
और उसके उत्ताप में
पीर का पर्वत
पल में गल गया,
जो बचना था वो बचा
शेष सब जल गया,
कुछ था जो कभी
बदला ही नहीं,
शेष सब बदल गया।
एक लम्हा टांकना था
ज़िंदगी की चादर में,
पर न जाने कैसे
उसमें वक़्त सारा सी लिया,
जिस तरह जीना था
उस तरह ही जी लिया,
एक बूँद पीना था
पर समंदर पी लिया।
-बोधि कृष्णा
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❣🌸❣