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पल भर में
टूटा करती हैं
जीवन भर की कसमें,
कालचक्र के आगे
कुछ भी नहीं
किसी के वश में…
पल में सारा दृश्य
बदला करता है,
अँधेरा उजाले में
और उजाला अँधेरे में
बदला करता है…
डूब सको जितना
डूबो जीवन के रस में,
किसे पता है
अगले पल नियति का
रंग कौन सा
उतरे नस नस में…
जीवन की लीला में
सब कुछ निर्भर है
सब कुछ पे,
यहाँ नहीं है अंतर
इसमें या उसमें…
उम्र बीत जाती है
आ पाने में
पारस के परस में,
या ख़ुद से ही
ख़ुद के दरस में…
बहती जीवन धारा में
कुछ भी नहीं यहाँ
किसी के वश में।
-बोधि कृष्णा
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