परमात्मा के परम रूप का प्रतीक है नटराज. भारत ने ही ऐसे अद्भुत प्रतीक खोजे हैं. नटराज अर्थात नृत्यमय भगवत्ता. नटराज की मूर्ति में नृत्य करते हुए महादेव हैं. परमात्मा को नृत्य की तरह कहने का ढंग बड़ा ही प्रीतिकर और काव्यमय है.
नृत्य ही एक ऐसी कला है जिसमें कला और कलाकार एक हैं. नृत्य और नृत्यकार एक हैं. नृत्यकार रुक जाये तो नृत्य भी खो जाता है. और नृत्य ही स्थान और समय में एक साथ है. अन्यथा अन्य कोई भी सृजन हो तो या तो वो स्थान को घेरता है या फिर समय को. जैसे एक चित्र स्थान में है और गान समय में है. नटराज के प्रतीक में यही रहस्य पिरोये हुए हैं.
हमने परमात्मा को ऐसा सृजनकार नहीं कहा कि वो सृष्टि को रचकर अलग हो गया. यहाँ तो सृजनकार और सृजन एक ही है. यह सृजन का नृत्य तो अहर्निश चल रहा है.
नटराज की मूर्ति के चारों ओर अग्नि का एक चक्र है. इस अग्निचक्र के भीतर ही परमात्मा नृत्य कर रहा है. अग्निचक्र से अभिप्राय है जीवन के प्रकट होने और नष्ट होने का वर्तुल. जो जन्मता है वो मिट जाता है. जीवन की अग्नि में सब समाहित होता रहता है.
यह संसार चक्र है जिसके भीतर सब आकार, विचार, धारणाएं बनते-मिटते रहते हैं. इस बनने-मिटने के चक्र के भीतर ही शिव आनंद-तांडव कर रहे हैं अर्थात परमात्मा आनंदमय नृत्य में है. नृत्य यहाँ घट रहा है सभी तत्वों के एक लय में होने से, शरीर, मन और चेतना के लयबद्ध हो जाने से.
अब इस प्रतीक में इशारा है मनुष्य के लिए अपने जीवन की लयबद्धता में डूबने का, जीवन के नृत्य में डूबने का, संसार-चक्र के केंद्र में स्थित हो जाने का, जहाँ साक्षी का नृत्य चल रहा है.
परमात्मा नृत्यमय है इसलिए पूर्ण अवतार के प्रतीक भगवान् श्री कृष्ण को भी नृत्यमय दिखाया गया. यह साक्षी का नृत्य है. तुम भी अपने जीवन के नृत्य को गति दो. तुम्हीं हो नर्तक. अपने जीवन की गतियाँ और लय तुम्हीं निर्मित कर रहे हो. तुम्हीं हो नटराज.
अद्भुत… ये नृत्य है जीवन का…जो निरंतर चल रहा है… गौर से देखो और इसमें डूब जाओ…. नमन सद्गुरु 🔥🌺🔥🙏🏻🙏🏻🙏🏻
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अप्रिवर्तन की पृष्ठभूमि पर ,सभी पारिवर्तन का नृत्य घट रहा है। सभी परिवर्तनों में , जब वही अपरिवर्तनीय दिखने लग जाए,तो सब कुछ नृत्यमय ही हो जाता है।🪷🙏
“हमारे परमात्मा ऐसा सृजनकर्ता नही ……”
अनंत श्री के ऐसे अद्भित्तीय विचार मन को विस्मय और प्रार्थना से भर देते हैं
गुरुदेव आपका बहुत बहुत आभार
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