कोई न जाने जीवन में

कोई न जाने जीवन में

सीधी चलती बाज़ी

कब उलटी पड़ती है,

सोये-सोये मन से हुई

भूल शूल सी गड़ती है।

जीवन से भरी हुई कोंपल

धीरे-धीरे बढ़ते-बढ़ते

पीली होकर झड़ती है,

बहती धारा रुक जाये

तो धीरे-धीरे सड़ती है।

यादों का सिलसिला

ही है अपना होना,

कोई याद माथे का

शीतल चंदन बनती है

और कोई याद यूँ ही

जीवन के पथ पर

धूल बनी उड़ती है।

जो होना है बस वो ही

होता है इस जीवन में,

फिर भी अरमानों की

एक दुनिया बसती है

सबके कोमल मन में।

अपने ही ढंग से

शाश्वत नियम से

ये दुनिया बनती है

और उजड़ती है,

जो जीवन के इस

ढंग और नियम से

एक हो जाता है,

उसकी जीवन धारा

अविरल बहती है।

-बोधि कृष्णा

This Post Has 6 Comments

  1. Sandeep

    Wao! Great it’s really an enlightened poetry…
    Thank you…

  2. पुरंजय

    अहोभाव 🪷🌹🙏

  3. पुरंजय

    Love & gratitude🙏

  4. Abhishek mishra

    “अनिश्चितता की प्रज्ञा” को काव्यात्मक रूप में दर्शाती ये सुंदरतम पंक्तियां।

  5. अनीता

    ❤🙏❤

  6. Rishi Prakash (Anant Santosh)

    🌻🙏🌹

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