जो व्यक्ति कुछ होने का प्रयास कर रहा है, कुछ है, या कुछ होने के सपनों में खोया है, वही व्यक्ति दुखी है। और जो व्यक्ति कुछ होने की आकांक्षा से मुक्त है वही सुखी है। यह बात जितनी साधारण दिखाई देती है उतनी है नहीं।
व्यक्ति का मन निरंतर अतीत या भविष्य में भागता रहता है और ऐसा मन दुःख से बच नहीं सकता। ऐसे मन के लिए वर्तमान भी एक कल्पना है और आकांक्षा है। वर्तमान तो उस मन में घटता है जो स्थिर हो गया है, निश्चल हो गया है। ऐसा मन सुख की तरंगों से भर जाता है। ये सुख मन से नहीं आता है। ये आता है चेतना के केंद्र से, जिसे मन के द्वारा अनुभव किया जाता है। वर्तमान इसीलिए तुम्हें अनिवार्य रूप से चेतना के केंद्र से जोड़ देता है।
वर्तमान समयातीत अवस्था है, जिसमें मन की कोई गति नहीं हो रही होती है। मन उस झील की तरह हो जाता है जिसमें अब कोई तरंगें नहीं उठ रही हैं। ऐसा मन सारी प्रसंशा और आलोचना से परे हो जाता है। ऐसे पारदर्शी मन से ही मन के पार चेतना के केंद्र में छलांग लग जाती है। उससे पहले सब बातें, बस मन की ही तरंगें होती हैं, और अपने साथ दुःख को ले ही आती हैं।
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Ahobhav🌺🌺🌷🙏🏻
Ahobhav gurudev🌺🌺🌹🌹🙏🙏
आपके आशिषों की वर्षा हमेशा होती रहे।
प्रणाम गुरुदेव।🙏🌹🙏
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